
इस्लामाबाद की वो टेबल, जहां उम्मीद थी कि इतिहास लिखा जाएगा… वहीं बैठकर एक बार फिर कूटनीति की फाइल बंद हो गई। ईरान और अमेरिका आमने-सामने बैठे, बातचीत हुई, बयान आए… लेकिन नतीजा? कुछ नहीं। बिल्कुल कुछ नहीं। फिर भी कहानी यहीं खत्म नहीं होती—क्योंकि असली ड्रामा तो उसके बाद शुरू हुआ।
“डील नहीं हुई… पर धन्यवाद!” – पाकिस्तान का अनोखा लॉजिक
पाकिस्तान ने इस पूरी असफल वार्ता को ऐसे पेश किया जैसे कोई बड़ी जीत हासिल कर ली हो। पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री इशाक डार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमेरिका और ईरान दोनों का धन्यवाद कर दिया। अब सवाल ये है जब डील हुई ही नहीं, तो धन्यवाद किस बात का? यह वैसा ही है जैसे मैच हारकर भी ट्रॉफी उठाने की कोशिश करना।
इशाक डार का बयान: ‘बातचीत ही बड़ी जीत है’
इशाक डार ने कहा कि पाकिस्तान इस वार्ता की मेजबानी करके “सम्मानित” महसूस कर रहा है। उनके मुताबिक, बातचीत शुरू होना ही बड़ी उपलब्धि है। संवाद ही हर समस्या का समाधान है। पाकिस्तान हमेशा शांति का समर्थक रहा है।
बातें अच्छी हैं… सुनने में भी सॉफ्ट लगती हैं…लेकिन जब जमीन पर नतीजा शून्य हो, तो ये शब्द थोड़े खोखले लगने लगते हैं।
आर्मी चीफ की एंट्री: कूटनीति या ‘क्रेडिट पॉलिटिक्स’?
इशाक डार ने सिर्फ वार्ता की बात नहीं की—उन्होंने पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर की भी जमकर तारीफ की।
डार के मुताबिक, मुनीर ने वार्ता में अहम भूमिका निभाई। सीजफायर की कोशिशों में उनका योगदान रहा। लेकिन सवाल फिर वही अगर भूमिका इतनी अहम थी, तो नतीजा कहां है?
असलियत: तनाव जस का तस, दुनिया फिर असमंजस में
ईरान और अमेरिका के बीच हाल के महीनों में तनाव लगातार बढ़ा है। मिडिल ईस्ट पहले ही बारूद के ढेर पर बैठा है। इस वार्ता से उम्मीद थी कि हालात थोड़े शांत होंगे…लेकिन अब स्थिति और ज्यादा अनिश्चित हो गई है।
कोई समझौता नहीं, कोई रोडमैप नहीं, बस बयानबाजी और कूटनीतिक मुस्कान।
पाकिस्तान की ‘मध्यस्थता’: असली कोशिश या इमेज बिल्डिंग?
पाकिस्तान ने खुद को इस पूरी प्रक्रिया में “मिडिलमैन” के रूप में पेश किया। लेकिन आलोचक सवाल उठा रहे हैं क्या यह असली कूटनीति थी? या सिर्फ ग्लोबल स्टेज पर अपनी इमेज चमकाने की कोशिश?
क्योंकि जब नतीजा फेल हो, तो “क्रेडिट लेना” थोड़ा अजीब जरूर लगता है।
सियासी सटायर: ‘डील गई, PR जीत गया’
अगर इस पूरे घटनाक्रम को एक लाइन में समझना हो, तो शायद यही होगा— डील फेल हुई लेकिन PR पास हो गया। पाकिस्तान ने एक असफल वार्ता को भी “डिप्लोमैटिक अचीवमेंट” की तरह पेश कर दिया। यह वही पॉलिटिक्स है जहां नतीजा नहीं, नैरेटिव मायने रखता है।
शांति की राह अभी लंबी है
इस्लामाबाद की यह वार्ता एक बार फिर यह दिखा गई कि मिडिल ईस्ट की राजनीति सिर्फ बातचीत से हल नहीं होने वाली। भरोसे की कमी। शर्तों का टकराव और राजनीतिक एजेंडा। इन सबके बीच शांति अभी भी एक दूर का सपना है। और जब तक असली समाधान नहीं निकलता…तब तक ऐसे “क्रेडिट शो” चलते रहेंगे।
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