रेट्रो रिव्यू : “बरखा” — तड़पाओगे तड़पा लो, पर इस क्लासिक को मिस मत करो

1959 में जब जगदीप को हीरो बनाया गया, तो सिनेमा प्रेमियों ने भी हैरानी से छाता खोल लिया — “ये वही कॉमिक जगदीप हैं?” लेकिन बरखा में उन्होंने पारंपरिक हीरो के सारे गुण निभाए। सीरियस भी लगे और रोमांटिक भी। और वो सैलाब वाला सीन… तड़पाओगे तड़पा लो बस वही मूड था! नंदा: बारिश में भी भीगी नहीं, बस नज़रों से बहा ले गईं नंदा का रोल पार्वती के रूप में बेहद ग्रेसफुल है। सादगी, समर्पण और संस्कार के ऐसे पैकेज के साथ उन्होंने साबित किया कि बरखा सिर्फ मौसम…

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रेट्रो रिव्यू : ‘बिन फेरे हम तेरे’ – शादी के बिना भी पूरी ज़िंदगी का साथ

आशा पारेख ने जमुना के किरदार में ऐसा जान डाल दिया है कि लगेगा कि आपके मोहल्ले की कोई “कठिन ज़माने की औरत” बोल रही है।बेच दी गई, बंधक बनाई गई, और फिर भी बिना शादी के एक आदमी और उसके बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाई — जमुना संघर्ष की चलता-फिरता प्रतीक बन जाती हैं। रिश्तों का मेलोड्रामा: शादी नहीं, पर संस्कार पूरे! जमुना और जगदीश शर्मा (राजेंद्र कुमार) का रिश्ता बिना शादी के पति-पत्नी जैसा दिखाया गया है। ये फिल्म 70s की होते हुए भी एक “लिव-इन विद सेंटीमेंट्स” वाला…

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रेट्रो रिव्यू हकीकत : जब देशभक्ति और बलिदान के सीन गूंजे थे स्क्रीन पर

1964 में बनी “हकीकत”, एक ऐसी फिल्म थी जिसने न केवल युद्ध की कच्ची सच्चाई दिखायी, बल्कि भारतीय सैनिकों की वीरता, उनके बलिदान और संघर्ष को भी स्क्रीन पर जीवंत किया। अगर आप सिनेमा के शौकिन हैं और अभी तक “हकीकत” नहीं देखी, तो मानो आप बॉलीवुड के उस खास दौर से अंजान हैं, जब हर फिल्म एक ज़िंदगी के रूप में बनती थी। फिल्म का संघर्ष: युद्ध या तो आप जीतते हैं, या फिर एक नई कहानियाँ बनाते हैं! चेतन आनंद द्वारा निर्देशित इस फिल्म की कहानी 1962 के…

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धूल का फूल: “तू हिंदू बनेगा…” – जो धर्मनिरपेक्षता का नेशनल एंथम बन गया

1959 में जब बी.आर. चोपड़ा ने अपने छोटे भाई यश को डायरेक्शन की गद्दी सौंपी, तब शायद उन्होंने नहीं सोचा होगा कि हिंदी सिनेमा का सबसे संवेदनशील फिल्ममेकर पैदा हो रहा है — और वो भी एक ऐसी कहानी से, जिसमें बच्चा जंगल में साँप के साथ सेफ है, लेकिन समाज के बीच अनसेफ! धर्म, नैतिकता और ‘कुर्सी’ — कोर्ट में सब चुप! महेश कपूर (राजेंद्र कुमार) ने न सिर्फ प्रेमिका मीना को छोड़ा, बल्कि अपने बेटे को भी जंगल में फेंक दिया। लेकिन VIP बनकर लौटे तो “जज साहब”…

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OTT की ULLU, ALTT कट गई, अब कंटेंट का ‘संस्कार संस्करण’ लोड होगा

भारत सरकार ने 25 OTT मोबाइल ऐप्स और वेबसाइट्स पर प्रतिबंध लगा दिया है। कारण? कंटेंट ऐसा कि परिवार में गलती से ऑन हो जाए तो टीवी भी खुद को ऑफ कर ले!सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अश्लील और महिला-विरोधी कंटेंट परोसने वाले इन प्लेटफॉर्म्स पर आईटी एक्ट की छड़ी चला दी है। आदेश में क्या कहा गया? मंत्रालय का कहना है कि ये ऐप्स न सिर्फ अश्लील कंटेंट दिखा रहे थे, बल्कि “डिजिटल मर्यादा” को धूल चटवा रहे थे।IT Act 2000, IT Rules 2021, भारतीय न्याय संहिता की धारा…

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“रेसलिंग छोड़, अब स्वर्ग में फाड़ रहे शर्ट – हल्क होगन नहीं रहे!”

रेसलिंग की दुनिया में एक युग का अंत हो गया। टेरी जीन बोलिया, जिन्हें दुनिया हल्क होगन के नाम से जानती है, का गुरुवार 24 जुलाई को 71 वर्ष की आयु में कार्डियक अरेस्ट से निधन हो गया। रिंग में अपनी अनोखी एंट्री, फटी हुई शर्ट और दमदार आवाज़ से उन्होंने 80s-90s की WWE को घर-घर पहुंचा दिया। सिर्फ रिंग में ही नहीं, स्क्रीन पर भी मचाया धमाल हल्क सिर्फ पंच-लाइनों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने VH1 का रियलिटी शो “Hogan Knows Best” किया, कुछ फिल्मों में सुपरहीरो की एक्टिंग…

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75 साल के नसीर साहब: जिनकी असली एक्टिंग ऑफ स्क्रीन भी चलती रही

1975 में ‘निशांत’ से फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाले नसीरुद्दीन शाह जब पहली बार पर्दे पर आए, तो खुशी के बजाय उदासी ज़्यादा थी। दूरदर्शन में रिजेक्शन, निजी जीवन की उथल-पुथल और कलाकार के रूप में पहचान बनाने की जद्दोजहद – ये सब उनकी कहानी के अहम हिस्से हैं। पिता से दूरी, माँ से गहरा लगाव नसीर के अपने पिता से संबंध बहुत अच्छे नहीं थे। पर उनकी माँ, जो ग़ुस्से में भी स्नेह लुटाती थीं, हमेशा उनका सहारा बनी रहीं। उनकी आत्मकथा ‘And Then One Day’ में माँ…

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Suraj (1966) Movie Review: राजेंद्र कुमार की आखिरी सुपरहिट

टी. प्रकाश राव के निर्देशन में बनी फिल्म ‘सूरज’, राजसी प्रेम कहानी को उस दौर की मसालेदार बॉलीवुड स्टाइल में परोसती है। यहाँ नायक सूरज सिंह (राजेंद्र कुमार) सिर्फ दिल चुराता नहीं, बल्कि राजकुमारी भी चुरा लेता है – वो भी घोड़े पर बैठकर, जैसे हॉलीवुड और राजश्री की फिल्मों में होता है। कथानक: कौन राजकुमार, कौन डाकू? राजकुमार प्रताप की गद्दी पर बैठा है वो, जो असल में संग्राम सिंह का बेटा है! और असली राजकुमारी को डाकू सूरज उठा ले जाता है — बस यहीं से शुरू होती…

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रेट्रो रिव्यू – हाथी मेरे साथी: राजू, हाथी और ड्रामा का तगड़ा झगड़ा!

1971 में रिलीज़ हुई “हाथी मेरे साथी” एक ऐसी फिल्म है जो न केवल राजेश खन्ना की दमदार एक्टिंग के लिए जानी जाती है, बल्कि अपने हाथियों और जंगली जानवरों के साथ दोस्ती के लिए भी मशहूर हुई।इस फिल्म को एम.ए. थिरुमुगम ने डायरेक्ट किया, जबकि पटकथा लिखी थी हिंदी सिनेमा के दो जादूगरों, सलीम-जावेद ने।अगर आपने सोचा कि ये कहानी सिर्फ रोमांस और ड्रामा है — नहीं, इसमें आपके दोस्त हाथी भी शामिल हैं, जो आपकी तुलना में ज्यादा ट्रबल शूटर साबित होते हैं। कहानी: अनाथ राजू और उसके…

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रेट्रो रिव्यू फौलाद: दारा सिंह और मुमताज ने 60s के पर्दे पर आग लगा दी

फौलाद की कहानी सीधे-साधे प्रेम से नहीं, बल्कि शाही दरबार की भविष्यवाणी, जातिगत पृष्ठभूमि, और सत्ता की भूख से शुरू होती है। एक महाराजा जब यह सुनता है कि उसकी बेटी किसी “नीच जाति” के युवक से शादी करेगी और उसकी गद्दी खतरे में पड़ जाएगी, तो वह सारे नवजात निम्न जाति के लड़कों को मरवाने का आदेश देता है।“इतिहास गवाह है – जब नेताओं को अपनी कुर्सी डगमगाती दिखे, तो उनका पहला निशाना आम जनता ही होती है – फिर चाहे वो फिल्म हो या संसद।” अमर बना फौलाद…

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