अब सूरज की रोशनी से घूमेगी कुम्हारों की चाक, यूपी माटीकला बोर्ड पहली बार देगा सोलर चाक; 1,700 कारीगरों को मिलेगा मुफ्त लाभ

लखनऊ: मिट्टी के बर्तनों को आकार देने वाले कुम्हारों के पारंपरिक कामकाज में अब सौर ऊर्जा नई भूमिका निभाने जा रही है। उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड पहली बार कारीगरों को सौर ऊर्जा से चलने वाली चाक उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहा है। इससे बिजली पर होने वाला खर्च कम होगा और कुम्हार कम लागत में अधिक उत्पादन कर सकेंगे। इससे उनकी आमदनी बढ़ने की भी उम्मीद है।

अब तक माटीकला बोर्ड की ओर से कारीगरों को बिजली से चलने वाली चाक दी जाती थी। इस बार पारंपरिक माटीकला को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के उद्देश्य से सोलर चाक देने का फैसला किया गया है। इसके वितरण की शुरुआत अगले वर्ष एक अप्रैल से होने की संभावना है।

पहले चरण में 1,700 कारीगरों को मिलेगी मुफ्त चाक

योजना के शुरुआती चरण में राजधानी लखनऊ समेत प्रदेश के सभी जिलों के 1,700 कारीगरों को सोलर चाक निश्शुल्क उपलब्ध कराई जाएगी। इसके लिए कारीगरों को मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना के तहत ऑनलाइन आवेदन करना होगा।

करीब 32 हजार रुपये लागत वाली यह चाक कारीगरों को बिना किसी शुल्क के दी जाएगी। योजना का मकसद कुम्हारों को आत्मनिर्भर बनाना और उनके पारंपरिक व्यवसाय को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ना है।

माटीकला बोर्ड के उप मुख्य कार्यपालक अधिकारी एलके नाग के मुताबिक, सौर ऊर्जा से चाक चलने पर बिजली की खपत और उत्पादन लागत दोनों कम होंगी। इससे ग्रामीण इलाकों में बिजली की उपलब्धता पर निर्भरता भी घटेगी।

बर्तन बनाने के साथ रोशनी की भी मिलेगी सुविधा

सोलर चाक की मदद से कारीगर मिट्टी के बर्तनों को आकार देने के साथ काम करने वाली जगह पर बल्ब भी जला सकेंगे। इससे उन्हें काम के दौरान रोशनी की सुविधा मिलेगी।

इसके अलावा कारीगरों को गैस से संचालित भट्ठी उपलब्ध कराने की भी योजना है। भट्ठी में आग को नियंत्रित रखने और निर्धारित तापमान बनाए रखने के लिए इस्तेमाल होने वाला ब्लोअर भी सौर ऊर्जा से चलाया जाएगा। इससे बर्तन पकाने की प्रक्रिया में भी ऊर्जा की बचत हो सकेगी।

परंपरागत माटीकला को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की पहल

सोलर चाक और अन्य सुविधाओं के जरिए माटीकला बोर्ड कुम्हारों के काम को आसान बनाने की दिशा में कदम उठा रहा है। बिजली खर्च में कमी और उत्पादन क्षमता बढ़ने से कारीगरों को आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद है। साथ ही, आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से पारंपरिक माटीकला को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

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