यूपी में सरकारी नौकरी के लिए राजनीतिक विचारधारा नहीं बनेगी बाधा, योगी सरकार ने शासनादेश पर किया स्थिति स्पष्ट

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी के लिए अभ्यर्थियों के चरित्र और पूर्ववृत्त सत्यापन से जुड़े शासनादेश को लेकर उठ रहे सवालों के बीच नियुक्ति विभाग ने स्थिति स्पष्ट की है। विभाग के मुताबिक, किसी अभ्यर्थी को केवल उसकी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर सरकारी नियुक्ति के लिए अनुपयुक्त नहीं माना जाएगा। सरकार की नीतियों की आलोचना करना या शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक गतिविधियों में हिस्सा लेना हिंसात्मक गतिविधियों के समान नहीं है।

नियुक्ति विभाग ने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक विचारधारा और हिंसात्मक गतिविधियों के बीच अंतर किया जाएगा। शासनादेश में ऐसे संगठनों का उल्लेख है, जिनका घोषित उद्देश्य हिंसात्मक तरीके से समाज की मौजूदा व्यवस्था को बदलना है। ऐसे संगठनों से जुड़ाव और उनसे संबंधित गतिविधियों पर निर्धारित नियमों के तहत विचार किया जाएगा।

नए शासनादेश में नियमों को किया गया स्पष्ट

सरकारी नियुक्तियों के लिए चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन से संबंधित प्रावधान पहले 28 अप्रैल 1958 को जारी शासनादेश में भी शामिल थे। नए शासनादेश में उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर विचार करने के लिए विभिन्न श्रेणियों के अपराधों से जुड़े प्रावधानों को एक जगह संकलित किया गया है।

इसका उद्देश्य सत्यापन प्रक्रिया को अधिक सरल, स्पष्ट और व्यवस्थित बनाना है, ताकि नियमों को समझने और उनका एकरूप तरीके से पालन करने में आसानी हो। विभाग के अनुसार, इससे अभ्यर्थियों के बीच अनावश्यक भ्रम की स्थिति से बचने में मदद मिलेगी।

सरकार की आलोचना और हिंसात्मक गतिविधियां अलग-अलग

शासनादेश में यह स्पष्ट किया गया है कि सरकार की नीतियों की आलोचना करना और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना हिंसात्मक गतिविधि नहीं है। लोकतांत्रिक तरीके से असहमति जताने को समाज की मौजूदा व्यवस्था को हिंसा के जरिए बदलने के प्रयास के समान नहीं माना जा सकता।

किसी भी अभ्यर्थी की उपयुक्तता का फैसला संबंधित नियमों, उपलब्ध तथ्यों और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर ही किया जाएगा। चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन का उद्देश्य सरकारी सेवा में नियुक्ति के लिए अभ्यर्थियों की उपयुक्तता की जांच करना है।

सकारात्मक बदलाव के प्रमाण पर भी होगा विचार

पहले के शासनादेश और नए शासनादेश, दोनों में 21 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद जांच की तारीख से पहले के तीन वर्षों के दौरान ऐसी गतिविधियों में भागीदारी को व्यक्ति की संलग्नता का प्रमाण मानने का प्रावधान है। हालांकि, यदि इस अवधि में व्यक्ति की प्रवृत्ति में सकारात्मक बदलाव के ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं तो उन पर भी विचार किया जाएगा।

नए शासनादेश के 10 प्रमुख प्रावधान

  • चरित्र प्रमाण पत्र मिलने के इंतजार में अभ्यर्थी की नौकरी नहीं जाएगी।
  • पुलिस की रिपोर्ट आने तक नियुक्ति नहीं रोकी जाएगी।
  • शर्तों के साथ नियुक्ति देने और सत्यापन के बाद उसकी पुष्टि करने की व्यवस्था होगी।
  • सामान्य मामलों में अभ्यर्थियों से पूछताछ नहीं होगी और न ही अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जाएंगे।
  • केवल एफआईआर दर्ज होने से किसी अभ्यर्थी की नौकरी नहीं छिनेगी।
  • पुलिस की प्रतिकूल रिपोर्ट आने पर भी अभ्यर्थी को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा।
  • तथ्यों को छिपाकर नौकरी हासिल करने वाले अभ्यर्थियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
  • लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम से जुड़े प्रावधानों का पालन किया जाएगा।
  • पहले किसी नौकरी से बर्खास्त किए गए व्यक्ति को सरकारी नौकरी नहीं दी जाएगी।
  • पोटा और टाडा के मामलों में गिरफ्तार किए गए लोगों को भी सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी।

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