नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आयातित जेनरिक दवाओं को लेकर नई चरणबद्ध टैरिफ नीति का ऐलान किया है। इस योजना के तहत शुरुआती दो वर्षों तक अमेरिका में आने वाली जेनरिक दवाओं पर कोई आयात शुल्क नहीं लगेगा, लेकिन इसके बाद एक वर्ष के लिए 100 प्रतिशत और फिर 200 प्रतिशत तक टैरिफ लागू किया जाएगा। ट्रंप प्रशासन का उद्देश्य दवा कंपनियों को अमेरिका के भीतर उत्पादन इकाइयां स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
क्या है ट्रंप की नई टैरिफ योजना?
नई नीति के अनुसार 1 अगस्त से अमेरिका में आयात होने वाली जेनरिक दवाओं पर दो साल तक शून्य टैरिफ लागू रहेगा। इसके बाद तीसरे वर्ष में 100 प्रतिशत और फिर अगले चरण में 200 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया जाएगा। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इससे विदेशी उत्पादन पर निर्भरता कम होगी और दवा निर्माण का बड़ा हिस्सा अमेरिका में स्थानांतरित किया जा सकेगा।
भारतीय दवा कंपनियों को फिलहाल राहत
इस फैसले से भारतीय दवा कंपनियों को तत्काल राहत मिली है, क्योंकि उन्हें अगले दो वर्षों तक बिना अतिरिक्त टैरिफ के अमेरिकी बाजार में निर्यात जारी रखने का अवसर मिलेगा। यह अवधि कंपनियों को अपनी आपूर्ति श्रृंखला, निवेश योजनाओं और उत्पादन रणनीति की समीक्षा करने के लिए अतिरिक्त समय देगी।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में 100 प्रतिशत और फिर 200 प्रतिशत टैरिफ लागू होने पर उन कंपनियों के लिए चुनौती बढ़ सकती है, जिन्होंने अमेरिका में स्थानीय उत्पादन क्षमता विकसित नहीं की होगी।
किन भारतीय कंपनियों पर पड़ सकता है असर?
भारत अमेरिका को सस्ती जेनरिक दवाओं का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। भारतीय दवा उद्योग की कई बड़ी कंपनियों की अमेरिकी बाजार में मजबूत मौजूदगी है। इनमें सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, सिप्ला, ल्यूपिन, अरबिंदो फार्मा और जायडस लाइफसाइंसेज जैसी कंपनियां शामिल हैं। इन कंपनियों की आय का बड़ा हिस्सा अमेरिकी जेनरिक दवा बाजार से आता है।
भारत के लिए अवसर भी, चुनौती भी
यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब ट्रंप प्रशासन वैश्विक दवा आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव लाने और विदेशी विनिर्माण पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहा है। यदि भारतीय कंपनियां समय रहते अमेरिका में उत्पादन सुविधाएं विकसित करती हैं तो वे भविष्य में भी वहां अपनी मजबूत मौजूदगी बनाए रख सकती हैं।
दूसरी ओर, यदि कंपनियां स्थानीय विनिर्माण नहीं बढ़ाती हैं तो ऊंचे टैरिफ के कारण अमेरिकी बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है।
अमेरिकी दवा नीति का हिस्सा है नया कदम
यह नई नीति प्रशासन की उस रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसके तहत अमेरिकी दवाओं की कीमतों को अन्य विकसित देशों के स्तर के करीब लाने और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है। हालांकि पेटेंट और नवाचार आधारित दवाओं को लेकर मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन के अनुसार, अमेरिका में जारी होने वाले 90 प्रतिशत से अधिक दवा प्रिस्क्रिप्शन जेनरिक दवाओं से जुड़े हैं। ऐसे में यह बाजार भारतीय दवा कंपनियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण निर्यात बाजारों में से एक बना हुआ है।
ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले अलग रणनीति
विशेषज्ञों के अनुसार ट्रंप प्रशासन की यह नीति ब्रांडेड दवाओं पर अपनाए गए रुख से अलग है। पिछले वर्ष कई बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने अमेरिकी सरकार के साथ समझौते किए थे, जिससे उनके अरबों डॉलर के दवा आयात को टैरिफ से राहत मिली थी। वहीं अप्रैल में प्रशासन ने ब्रांडेड दवाओं पर भी कड़े शुल्क लगाने की संभावना जताई थी, यदि कंपनियां सरकारी मूल्य निर्धारण व्यवस्था या घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए तैयार नहीं होतीं।
