लखनऊ: बहुजन समाज पार्टी एक बार फिर उत्तर प्रदेश की सियासत में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही है। इसी कड़ी में पश्चिमी उत्तर प्रदेश को केंद्र में रखते हुए पार्टी प्रमुख मायावती ने सपा के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों में राजनीतिक घेराबंदी शुरू कर दी है। बसपा अब 2007 विधानसभा चुनाव की तरह सोशल इंजीनियरिंग के पुराने फॉर्मूले को दोबारा धार देने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
सोशल इंजीनियरिंग के जरिए पुराने समीकरण साधने की कोशिश
बसपा नेतृत्व इस बार भी दलित वोट बैंक के साथ-साथ ब्राह्मण और मुस्लिम मतदाताओं को साधने की रणनीति पर काम कर रहा है। पार्टी स्तर पर माना जा रहा है कि इन सामाजिक समीकरणों को साधकर ही 2007 जैसा राजनीतिक प्रदर्शन दोहराया जा सकता है। इसी के तहत मायावती मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए लगातार सक्रिय दिखाई दे रही हैं और कई मौकों पर सार्वजनिक मंचों से भी अपील कर चुकी हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर खास फोकस
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम और दलित मतदाताओं का प्रभाव कई सीटों पर निर्णायक माना जाता है। दो दर्जन से अधिक विधानसभा सीटों पर यह समीकरण 25 से 40 प्रतिशत तक पहुंचता है। बसपा की रणनीति इन्हीं सीटों पर मजबूत पकड़ बनाकर चुनावी बढ़त हासिल करने की है, जिससे विधानसभा में पार्टी की स्थिति मजबूत हो सके।
सपा के वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश
राज्य में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा फिलहाल समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ा हुआ माना जाता है। संगठनात्मक स्तर पर सपा ने भी मुस्लिम नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर अपनी पकड़ मजबूत की है। ऐसे में बसपा के लिए यह वोट बैंक अपने पाले में लाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। इसी चुनौती को देखते हुए पार्टी अब स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली मुस्लिम चेहरों को जोड़ने की कोशिश कर रही है।
पार्टी में बड़े मुस्लिम चेहरों की कमी बनी चुनौती
बसपा के कमजोर होने के बाद कई प्रमुख मुस्लिम नेताओं ने पार्टी से दूरी बना ली थी। संगठन में बड़े मुस्लिम चेहरों की कमी अब पार्टी के लिए राजनीतिक चुनौती के रूप में सामने है। इसी अंतर को भरने के लिए मायावती फिर से मुस्लिम समाज को पार्टी से जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही हैं।
सर्वे के आधार पर टिकट वितरण की तैयारी
बसपा इस बार चुनावी तैयारियों में किसी भी तरह की गलती से बचने के लिए बेहद सावधानी से आगे बढ़ रही है। पार्टी ने टिकट वितरण से पहले विस्तृत जमीनी सर्वे कराने का फैसला किया है। संगठन को सक्रिय करते हुए विधानसभावार रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि उन सीटों पर ध्यान केंद्रित किया जा सके जहां मुस्लिम और दलित वोट निर्णायक भूमिका में हैं।
