
नोएडा की फैक्ट्रियों में मशीनें खामोश हैं… लेकिन सड़कों पर गूंज रहा है एक ही नारा—“11 हजार में दम नहीं!”। नोएडा में प्राइवेट कर्मचारियों का गुस्सा अब आंदोलन में बदल चुका है। सरकार ने वेतन बढ़ाया जरूर, लेकिन कर्मचारियों के लिए ये राहत नहीं, मज़ाक बनकर रह गई है।
₹20,000 की मांग पर अड़े कर्मचारी
कर्मचारियों का कहना है कि मौजूदा सैलरी में घर चलाना नामुमकिन हो गया है। महंगाई, किराया, बच्चों की पढ़ाई—सब कुछ महंगा है, लेकिन सैलरी अब भी “11 हजार क्लब” में अटकी हुई है। यही वजह है कि अब मजदूर ₹20,000 से कम पर समझौता करने को तैयार नहीं हैं।
सरकार का फैसला—राहत या ‘लॉलीपॉप’?
योगी आदित्यनाथ सरकार ने तुरंत एक्शन लेते हुए न्यूनतम मजदूरी में करीब ₹3000 तक की बढ़ोतरी की। नई दरें 1 अप्रैल 2026 से लागू कर दी गईं।
लेकिन कर्मचारियों का कहना है—“ये बढ़ोतरी नहीं, बस जख्म पर पट्टी है… इलाज नहीं।”
प्रदर्शन हुआ उग्र, पुलिस से टकराव
नोएडा फेस-2 और सेक्टर-63 में प्रदर्शन के दौरान हालात बिगड़ गए। नारेबाजी, तोड़फोड़ और पुलिस से झड़प की घटनाएं सामने आईं। हालात काबू करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा।
350 गिरफ्तार, CCTV से पहचान जारी
पुलिस के मुताबिक करीब 400-500 लोगों की भीड़ फैक्ट्रियों में घुस गई और तोड़फोड़ शुरू कर दी। अब तक 350 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। बाकी आरोपियों की पहचान CCTV फुटेज से की जा रही है।
फैक्ट्रियों में सन्नाटा, उत्पादन ठप
प्रदर्शन का असर अब इंडस्ट्री पर साफ दिख रहा है। कई फैक्ट्रियों में काम पूरी तरह बंद है। फैक्ट्री मालिकों का कहना है— “अचानक इतनी सैलरी बढ़ाना संभव नहीं, इससे लागत बढ़ेगी और बिज़नेस पर असर पड़ेगा।”
क्या है असली टकराव?
यह सिर्फ सैलरी का मामला नहीं, बल्कि जीवन स्तर बनाम इंडस्ट्री लागत की लड़ाई है।
कर्मचारी: “जिंदगी चलानी है”
कंपनियां: “खर्च संभालना है”
बीच में फंसी है सरकार… और सवाल वही— क्या कोई मिडिल ग्राउंड निकल पाएगा?
नोएडा की सड़कों पर उठी ये आवाज सिर्फ एक शहर की नहीं है… ये उस हर मजदूर की आवाज है जो पूछ रहा है— “मेहनत मेरी, लेकिन जिंदगी इतनी सस्ती क्यों?”
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