
मिडिल ईस्ट में चल रही जंग का धुआं अब सरहद पार कर पाकिस्तान के भीतर घुस चुका है। जहां पहले गोलियां सीमाओं पर चल रही थीं, अब शब्दों के गोले मस्जिदों और गलियों में फूट रहे हैं।
और इस बार चिंगारी कोई आम बयान नहीं—बल्कि Asim Munir का वो कथित तंज है जिसने हालात को बारूद बना दिया।
“ईरान पसंद है तो वहां जाओ!”—बयान या भड़काऊ चिंगारी?
रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर में हुई हाई-लेवल मीटिंग…12 से ज्यादा शिया धर्मगुरु… और बीच में बैठे सेना प्रमुख।
लेकिन बातचीत diplomacy से ज्यादा dominance में बदल गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, Allama Agha Shifa Najafi ने खुलासा किया कि मीटिंग के दौरान मुनीर ने शिया समुदाय पर तंज कसते हुए कहा, “अगर ईरान से इतनी मोहब्बत है तो वहीं चले जाओ।”
अब सवाल ये नहीं कि ये कहा गया या नहीं… सवाल ये है कि ऐसा माहौल क्यों बना?
ईरान जंग का ‘रिपल इफेक्ट’—सीमा पार से समाज तक
Iran और Israel के बीच बढ़ते टकराव ने पूरे क्षेत्र को दो हिस्सों में बांटना शुरू कर दिया है। पाकिस्तान, जो पहले ही sectarian fault lines पर खड़ा है, अब इस global conflict का indirect battlefield बनता दिख रहा है। गिलगिट-बाल्टिस्तान में हुए प्रदर्शन, सेना के खिलाफ गुस्सा, और अब ये बयान—सब मिलकर explosive cocktail बना रहे हैं।
गिलगिट से इस्लामाबाद तक—गुस्से की लहर
रिपोर्ट्स बताती हैं कि गिलगिट-बाल्टिस्तान में सेना की इमारतों पर हमले हुए। ये सिर्फ protest नहीं—ये frustration का public explosion था। और जब सत्ता जवाब देने के बजाय “जाओ ईरान” जैसा जवाब दे…तो हालात संभलते नहीं, और बिगड़ते हैं।

सत्ता vs समाज: पुराना खेल, नया बहाना
पाकिस्तान में शिया-सुन्नी तनाव कोई नई कहानी नहीं है। लेकिन हर बार external conflict को internal distraction बना देना—ये strategy पुरानी है।
सीधा सा फार्मूला बाहर जंग = अंदर polarization सवाल खत्म = सत्ता safe
“पाकिस्तान की सत्ता जब भी दबाव में आती है, उसे ‘external enemy’ और ‘internal divide’ की याद आ जाती है। फर्क बस इतना है कि इस बार script Middle East ने लिखी है, और dialogue Rawalpindi से आ रहा है। Shia-Sunni tension कोई नया issue नहीं, लेकिन उसे trigger करना—ये politics का shortcut है। और shortcut हमेशा खतरनाक मोड़ पर ले जाता है।”
आगे क्या? बारूद सूखा नहीं है
स्थिति अभी fragile है। एक बयान ने जो दरार पैदा की है, वो अगर भरी नहीं गई तो बड़ा टकराव बन सकती है। मस्जिदों से सियासत तक polarization, समाज से सुरक्षा तक instability और ऊपर से global war pressure ये combination explosive है।
जंग सिर्फ बॉर्डर पर नहीं होती
मिडिल ईस्ट की जंग ने एक बार फिर साबित कर दिया असली युद्ध सिर्फ मिसाइलों से नहीं, narratives से लड़ा जाता है। और पाकिस्तान में अभी narrative खतरनाक मोड़ पर खड़ा है।
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