डिजिटल सजा?” सुप्रीम फटकार- आरोपी की बेइज्जती पड़ेगी भारी

शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

आजकल सोशल मीडिया पर ‘क्राइम कंटेंट’ सिर्फ खबर नहीं, तमाशा बन चुका है। हथकड़ी में आरोपी, घुटनों पर बैठा इंसान, रस्सियों से बंधा चेहरा… और पीछे चलता कैमरा। यह रिपोर्टिंग नहीं, ‘डिजिटल परेड’ है। और अब इस पर देश की सबसे बड़ी अदालत—Supreme Court of India—ने सख्त नाराजगी जताई है।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “यह डिजिटल अरेस्ट है”

CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने साफ कहा— यह ट्रेंड “Digital Arrest” जैसा है। मतलब? कोर्ट के बाहर ही सजा। बिना ट्रायल, बिना फैसला—सीधा सोशल मीडिया पर ‘सार्वजनिक बेइज्जती’।

कोर्ट का इशारा सिर्फ पुलिस पर नहीं, बल्कि उन तथाकथित “न्यूज क्रिएटर्स” पर भी था जो कंटेंट के नाम पर ‘ब्लैकमेलिंग’ का धंधा चला रहे हैं।

कैमरा ऑन, इंसानियत ऑफ

एक आरोपी—जो अभी कोर्ट में दोषी साबित भी नहीं हुआ— उसे सोशल मीडिया पर ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे फैसला हो चुका हो।

हाथ में हथकड़ी, चेहरा झुका हुआ, पुलिस के साथ खींचतान और पीछे बजता बैकग्राउंड म्यूजिक यह पत्रकारिता नहीं, “TRP का ट्रायल” है।

“Breaking News या Breaking Dignity?”

आज का कंटेंट क्रिएटर पूछता है “कितने व्यू आए?” कोर्ट पूछ रही है “कितने अधिकार तोड़े?” पहले खबर बनती थी, अब “कंटेंट” बनता है।
और फर्क इतना है कि खबर में तथ्य होते हैं, कंटेंट में ‘ड्रामा’।

पुलिस भी कटघरे में क्यों?

याचिका में कई राज्यों—हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, असम, छत्तीसगढ़—की पुलिस पर सवाल उठे।

आरोप यह कि आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से आरोपी की अपमानजनक तस्वीरें पोस्ट की गईं। वीडियो बनाकर वायरल किया गया। कोर्ट ने पहले भी गाइडलाइंस दी थीं कि आरोपी के अधिकारों का सम्मान जरूरी है। लेकिन सवाल वही “Follow कौन कर रहा है?”

लॉ एक्सपर्ट का बड़ा बयान

लॉ एक्सपर्ट अमित तिवारी कहते हैं:

“यह ट्रेंड बेहद खतरनाक है क्योंकि यह संविधान के Article 21 यानी ‘Right to Life and Personal Liberty’ का सीधा उल्लंघन करता है। जब तक कोर्ट किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराती, तब तक उसकी गरिमा और प्राइवेसी पूरी तरह सुरक्षित रहनी चाहिए। सोशल मीडिया पर इस तरह की तस्वीरें डालना न सिर्फ कानूनी जोखिम पैदा करता है, बल्कि यह न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांत—‘Innocent until proven guilty’—को भी कमजोर करता है। अगर इसे समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह भीड़तंत्र को बढ़ावा देगा, जहां फैसला अदालत नहीं, बल्कि वायरल वीडियो तय करेंगे।”

आम यूजर के लिए चेतावनी

अगर आप भी ऐसे वीडियो शेयर या पोस्ट करते हैं, तो सावधान हो जाइए। यह कंटेंट illegal माना जा सकता है। आपके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है और अकाउंट भी ब्लॉक हो सकता है। यानी लाइक्स के चक्कर में “लॉ का लफड़ा” हो सकता है।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को कहा है कि वे नई और विस्तृत याचिका दाखिल करें, जिसमें राज्यों द्वारा गाइडलाइंस के पालन की स्थिति साफ हो।

मतलब अब सिर्फ टिप्पणी नहीं, एक्शन भी आ सकता है।

डिजिटल भीड़ बनाम न्याय

आज सोशल मीडिया एक नया कोर्ट बन गया है जहां जज भी यूजर है, और फैसला भी कमेंट सेक्शन में होता है। लेकिन असली सवाल यही है—
क्या हम न्याय चाहते हैं, या सिर्फ ‘वायरल कंटेंट’? क्योंकि अगर यही चलता रहा, तो अगला आरोपी कोई और नहीं शायद हम खुद हों।

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