गैस सिलेंडर ने जेब जलाई तो कंडों ने भी कीमत बढ़ा दी – देसी ईंधन के लगे पर

Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

गल्फ की आग रसोई तक पहुँच गयी है, गैस सिलेंडर या तो मिल नहीं रहे या ब्लैक हो रहे है। लखनऊ की गलियों में इन दिनों यही कहानी सुनाई दे रही है। जहां कभी गोबर के कंडे गरीब की रसोई का सस्ता सहारा माने जाते थे, अब वही कंडे भी ‘मिनी लग्ज़री फ्यूल’ बनते दिख रहे हैं।

लखनऊ की गलियों से उठती महंगाई की गंध

राजधानी Lucknow के कई इलाकों में इन दिनों एक दिलचस्प लेकिन कड़वी तस्वीर दिख रही है। गैस सिलेंडर की बढ़ती  कमी और कीमतों के बीच लोग फिर से देसी ईंधन की ओर लौट रहे हैं। लेकिन यहां भी राहत नहीं मिल रही।

गोबर के कंडों की कीमत अचानक बढ़ गई है। जहां कुछ महीने पहले तक 100 कंडे 80 से 100 रुपये में मिल जाते थे, वहीं अब कई जगह 100 कंडों की कीमत 150 से 300 रुपये तक पहुंच गई है।

यानी महंगाई ने अब गोबर तक को नहीं छोड़ा।

“मांग बढ़ी तो भाव भी बढ़े”

कंडे बेचने वाले कारोबारी मुशीर बताते हैं कि हालात तेजी से बदले हैं।

उनके मुताबिक,
“पहले लोग गैस पर ही खाना बनाते थे। अब गैस मिलना मुश्किल हुई तो कई घरों में चूल्हा फिर से जलने लगा। मांग बढ़ी तो कंडों का रेट भी बढ़ गया।”

यह बाजार का वही पुराना नियम है — Demand बढ़े तो Price भी चढ़े।

देसी चूल्हा फिर चर्चा में

दिलचस्प बात यह है कि कंडे सिर्फ ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं रहे। शहर के कई परिवार भी अब इन्हें खरीद रहे हैं।

कुछ लोग इन्हें चूल्हे में खाना बनाने के लिए, तंदूर जलाने के लिए, धार्मिक अनुष्ठानों के लिए खरीद रहे हैं। यानी जो चीज कभी ‘गरीबी का ईंधन’ कही जाती थी, वही अब शहर की जरूरत बनती जा रही है।

होली के बाद अचानक बढ़े दाम

स्थानीय कारोबारियों के मुताबिक Holi के आसपास कंडों की कीमत काफी कम थी। उस समय 100 कंडे 80–100 रुपये में मिल रहे थे।

लेकिन होली के बाद अचानक जब गैस सिलेंडर मिलने में मुश्किलें हुई तो मांग बढ़ी और बाजार का मिजाज बदल गया।

अब कई जगह 150 रुपये, 200 रुपये यहां तक कि 300 रुपये तक में सौ कंडे बिकते देखे जा रहे हैं।

महंगाई का देसी गणित

अगर महंगाई को समझना हो तो किसी बड़े आर्थिक रिपोर्ट की जरूरत नहीं। बस बाजार की गलियों में घूम लीजिए। जब गैस महंगी होती है तो लोग लकड़ी पर आते हैं। लकड़ी महंगी होती है तो लोग कंडों पर आते हैं। और जब कंडे भी महंगे हो जाएं तो समझ लीजिए कि महंगाई अब रसोई के हर कोने में पहुंच चुकी है।

लखनऊ के बाजार की यह छोटी सी कहानी दरअसल बड़ी आर्थिक सच्चाई की तरफ इशारा करती है। ऊर्जा की कीमतें जब बढ़ती हैं तो उसका असर सिर्फ पेट्रोल पंप या गैस एजेंसी तक सीमित नहीं रहता। वह असर सीधे रसोई तक पहुंचता है — और कभी-कभी गोबर के कंडों तक भी।

महंगाई का यही देसी संस्करण इन दिनों लखनऊ की गलियों में खुलकर दिखाई दे रहा है।

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