
मिडिल ईस्ट की जंग अब 15वें दिन में प्रवेश कर चुकी है. धुएं से भरे आसमान और मिसाइलों की गूंज के बीच एक सवाल लगातार उठ रहा है.
किसका पलड़ा भारी है? कागज पर देखें तो इजरायल और अमेरिका की संयुक्त सैन्य ताकत ने ईरान के कई ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया.
लेकिन जंग का दूसरा चेहरा भी है. ईरान के जवाबी हमलों ने कई ऐसे निशाने साधे जिनकी कीमत अरबों डॉलर में है.
यही वजह है कि अब इस युद्ध की चर्चा सिर्फ ईरान बनाम इजरायल नहीं बल्कि ईरान बनाम अमेरिका के रूप में होने लगी है.
ईरान के ठिकानों पर तबाही की बरसात
पिछले 15 दिनों में इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान के कई अहम ढांचों को निशाना बनाया. हमलों में स्कूल, यूनिवर्सिटी, एयरपोर्ट, सरकारी कार्यालय और सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचा. इसके अलावा ईरान की IRGC के ठिकाने, आर्मी बेस, नेवी बेस और एयरफोर्स इंस्टॉलेशन भी हमलों की जद में आए.
अमेरिका ने अपने अभियान को Operation Epic Fury नाम दिया, जबकि इजरायल ने इसे Operation Roaring Lion कहा.
नाम चाहे जितने भी शक्तिशाली हों, लेकिन जंग का हिसाब सिर्फ नामों से नहीं बल्कि नुकसान से तय होता है.
जवाबी हमले में अमेरिका को बड़ा झटका
ईरान ने जवाबी कार्रवाई में सीधे इजरायल के बजाय मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया. ईरान का दावा है कि खाड़ी देशों में बने 17 अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए गए.
इन हमलों में बहरीन, कुवैत, कतर, जॉर्डन और यूएई के कई बेस प्रभावित हुए. बहरीन की राजधानी मनामा में स्थित अमेरिकी नौसेना के फिफ्थ फ्लीट मुख्यालय पर भी मिसाइल हमला हुआ, जिसमें कई इमारतों और सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम को नुकसान पहुंचा.
अरबों डॉलर के डिफेंस सिस्टम पर हमला
ईरान के हमलों में अमेरिका को सबसे बड़ा आर्थिक झटका कतर के अल उदेद एयर बेस पर लगा. यहां तैनात AN/FPS-132 अर्ली वार्निंग रडार सिस्टम मिसाइल हमले में क्षतिग्रस्त हो गया. इस सिस्टम की कीमत करीब 1.1 बिलियन डॉलर बताई जाती है.
इसके अलावा यूएई में तैनात अमेरिकी THAAD मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी हमले की जद में आया. THAAD सिस्टम की कीमत लगभग 22 हजार करोड़ रुपये बताई जाती है.

जंगी जहाज और एयरक्राफ्ट हादसे
युद्ध के दौरान अमेरिका के सबसे बड़े युद्धपोत USS Gerald Ford में भी आग लगने की खबर सामने आई. हालांकि आग जहाज के मुख्य सिस्टम तक नहीं पहुंची और बड़ा नुकसान टल गया.
इसी बीच इराक में अमेरिकी वायुसेना का KC-135 रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट भी क्रैश हो गया. अमेरिकी अधिकारियों ने इसे तकनीकी हादसा बताया, जबकि ईरानी मीडिया ने दावा किया कि विमान पर हमला हुआ था.
फ्रेंडली फायर की शर्मनाक कहानी
युद्ध के दौरान अमेरिका ने तीन F-15E Strike Eagle लड़ाकू विमान भी खो दिए. रिपोर्ट के अनुसार, यह नुकसान दुश्मन के हमले से नहीं बल्कि फ्रेंडली फायर की वजह से हुआ. कुवैती एयर डिफेंस सिस्टम ने गलती से इन विमानों को निशाना बना लिया.
हालांकि सभी छह पायलट सुरक्षित बचा लिए गए.
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
मिडिल ईस्ट मामलों के विशेषज्ञ हुसैन अफसर कहते हैं, “यह युद्ध सिर्फ मिसाइलों की लड़ाई नहीं है. यह रणनीति की लड़ाई है. ईरान सीधे मोर्चे पर नहीं बल्कि अमेरिका के सैन्य नेटवर्क पर हमला कर रहा है.”
अमेरिका विशेषज्ञ रूबी अरुण का मानना है, “अमेरिका की सैन्य ताकत बहुत बड़ी है, लेकिन मिडिल ईस्ट में उसके फैले हुए ठिकाने उसे कमजोर भी बनाते हैं. हर बेस संभावित टारगेट बन जाता है.”
वहीं रक्षा विशेषज्ञ अजीत उज्जैनकर कहते हैं, “इस युद्ध ने दिखाया है कि आधुनिक युद्ध में अरबों डॉलर के सिस्टम भी मिसाइलों के सामने असुरक्षित हो सकते हैं.”
युद्ध का असली सबक
मिडिल ईस्ट की इस जंग ने एक बार फिर दुनिया को याद दिलाया है कि आधुनिक युद्ध सिर्फ मोर्चे पर नहीं लड़े जाते. यह युद्ध रडार, मिसाइल, साइबर नेटवर्क और रणनीतिक ठिकानों के बीच लड़ा जाता है. और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जिस देश को सबसे ताकतवर माना जाता है, वही युद्ध में सबसे महंगे नुकसान झेलता है.
कुमार विश्वास ने बृजेश पाठक पर कसा तंज, राज्यसभा की कसक तो नहीं ये
