
Neechi Jaati Kahne Walon Ke Naam सिर्फ एक उपन्यास नहीं, सामाजिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट है। लेखक Ashish Sharma ने 1940 से 2044 तक की 104 साल लंबी पारिवारिक यात्रा को ऐसे पन्नों में उतारा है, जो पढ़ते समय हथेली में चुभते रहते हैं।
एक ठाकुर और एक दलित की दोस्ती से शुरू हुई कहानी, वादे से भरी थी। सपना था कि आने वाली पीढ़ियाँ जाति से ऊपर उठेंगी।
सवाल यह है क्या सपना इतिहास के वजन से दब गया?
छह पीढ़ियाँ, एक ही घाव
रघुवीर और रामदीन ने 1940 में जो उम्मीद बोई, वह छह पीढ़ियों तक जिंदा रही। बेटों ने निभाया, पोतों ने संभाला, अगली पीढ़ियों ने थामे रखा।
लेकिन 2044 में तस्वीर चौंकाती है। हिंसा वही। नफरत वही और “नीची जाति” का जहर अब भी शब्दों में तैरता हुआ। लेखक ने कोई सुपरहीरो नहीं गढ़ा। यहां किरदार थकते हैं, डरते हैं, समझौते करते हैं। Activism यहां पोस्टर नहीं, personal cost है। रिश्ते टूटते हैं। health बिगड़ती है। careers रास्ता बदल लेते हैं।
जीत का मिथक और सिस्टम का सच
इस उपन्यास में कोई grand victory parade नहीं निकलती। छोटी-छोटी लड़ाइयाँ हैं, जो अधूरी रह जाती हैं।

System एक विशाल दीवार की तरह खड़ा है। लोग टकराते हैं। गिरते हैं। फिर भी उठते हैं। सटायर की हल्की धार से लेखक यह पूछता है कि अगर 100 साल बाद भी शब्द वही हैं, तो बदलाव की स्पीड किस गियर में फंसी है?
प्रेरणा नहीं, असहजता का उपहार
यह किताब motivational poster नहीं है। यह uncomfortable mirror है। यह आपको अच्छा महसूस कराने नहीं आई। यह आपके भीतर की शांति में हलचल पैदा करने आई है। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
100 साल बाद भी सवाल जिंदा क्यों?
भारत में जाति पर बहस अक्सर भाषणों में बड़ी दिखती है, जमीनी स्तर पर छोटी। लेखक का सबसे बड़ा सवाल सीधे पाठक की नींद पर दस्तक देता है अगर sacrifice के बाद भी हालात वही हैं, तो अगली सदी का रास्ता कौन तय करेगा?
यह किताब उन लोगों के नाम है जो “नीची जाति” कहकर आगे बढ़ जाते हैं। ताकि वे रुकें। और देखें कि एक शब्द, छह पीढ़ियों तक कितना भारी पड़ सकता है।
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