भाई साब! ईरान पर हमला हुआ तो अमेरिका के लिए बड़ी मुसीबत मुँह खोलेगी

हुसैन अफसर
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ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की आधिकारिक वेबसाइट पर हाल ही में एक ईरानी अखबार का संपादकीय साझा किया गया। शीर्षक था: “दुश्मन के हमले की स्थिति में ईरान की रणनीति क्या होगी?”

सादा-ए-ईरान अखबार के इस लेख में अमेरिका को स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि अगर कोई नया संघर्ष छिड़ता है, तो वह सीमित भूगोल तक सीमित नहीं रहेगा। यानी युद्ध का नक्शा चौकोर नहीं, बहुभुज हो सकता है।

“रेड लाइन” का नया गणित

लेख में कहा गया है कि भविष्य के संभावित युद्ध में पारंपरिक रेड लाइंस अप्रासंगिक हो सकती हैं। संदेश साफ है कि जवाब सिर्फ सीमा के भीतर नहीं रहेगा।

एक बयान में यह भी कहा गया कि यदि अमेरिकी आक्रामकता ईरानी जमीन और उसके नागरिकों तक पहुंची, तो प्रतिक्रिया वैश्विक आयाम ले सकती है। इस तरह की भाषा रणनीतिक दबाव बनाने की कूटनीतिक शैली मानी जाती है।

क्षेत्रीय समीकरण और बहु-मोर्चा रणनीति

आर्टिकल में 12-दिवसीय हालिया संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उस दौरान क्षेत्रीय सहयोगियों ने प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं किया था और ईरान ने अकेले सामना किया।

हालांकि संकेत यह है कि किसी भी नए टकराव में दुश्मन को एक नहीं, कई मोर्चों पर चुनौती मिल सकती है। यानी संघर्ष का थिएटर एक शहर या एक सीमा तक सीमित नहीं रहेगा।

भू-राजनीति में इसे “डिटेरेंस मैसेजिंग” कहा जाता है, जहां शब्द भी रणनीतिक हथियार बन जाते हैं।

परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल दावे

ईरान ने अपने मिसाइल प्रोग्राम और परमाणु महत्वाकांक्षाओं को लेकर लगाए गए अमेरिकी आरोपों को खारिज किया है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाकी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि झूठ को बार-बार दोहराने की रणनीति अपनाई जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान के खिलाफ संगठित दुष्प्रचार चलाया जा रहा है। यह बयान सीधे तौर पर वॉशिंगटन और तेल अवीव की नीतियों पर निशाना साधता दिखता है।

बयानबाज़ी की राजनीति

दुनिया का सबसे महंगा खेल अब शतरंज नहीं, बयानबाज़ी है। हर देश अपने शब्दों को ऐसे पॉलिश करता है जैसे वे कूटनीतिक खंजर हों। जब वेबसाइट पर छपा एक संपादकीय वैश्विक सुर्खी बन जाए, तो समझिए कि तनाव सिर्फ जमीन पर नहीं, डिजिटल स्पेस में भी तैनात है।

अमेरिका और ईरान के बीच पहले से तनावपूर्ण रिश्तों में यह बयान एक और परत जोड़ता है। आने वाले हफ्तों में कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो सकती हैं। सवाल यह है कि यह चेतावनी सिर्फ रणनीतिक दबाव है या किसी बड़े घटनाक्रम की प्रस्तावना?

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