
गाजियाबाद की भारत सिटी सोसाइटी में 4 फरवरी को जो हुआ, उसने पूरे शहर को झकझोर दिया। 16 वर्षीय निशिका, 14 वर्षीय प्राची और 12 वर्षीय पाखी — तीन सगी बहनों ने एक साथ 9वीं मंजिल से कूदकर जान दे दी। यह सिर्फ एक crime news नहीं, बल्कि आज के urban परिवार, parenting gaps और digital addiction पर बड़ा सवाल है।
अस्थि विसर्जन के बाद तेज हुई पूछताछ
घटना के बाद बच्चियों का अस्थि विसर्जन दिल्ली में किया गया। उसी दिन पुलिस ने पिता चेतन कुमार और उनकी तीनों पत्नियों से लंबी पूछताछ की। DCP ट्रांस हिंडन कार्यालय में सवाल-जवाब का दौर चला, लेकिन फिलहाल किसी को हिरासत में नहीं लिया गया।
सोसाइटी में अब भी बैरिकेडिंग लगी है — डर और सन्नाटे की स्थायी निशानी।
School से दूरी, Society से दूरी
जांच में सामने आया कि तीनों बच्चियां काफी समय से स्कूल नहीं जा रही थीं। कोरोना के बाद पढ़ाई से कटाव, social isolation और routine टूटना। ये सारे red flags अब सामने आ रहे हैं। कोई भारी कर्ज नहीं, कोई तात्कालिक financial crisis नहीं — यानी कहानी सिर्फ पैसों की नहीं है।
तीन पत्नियां, एक परिवार और उलझा हुआ माहौल
पुलिस पूछताछ में परिवार की संरचना ने जांच को और जटिल बना दिया। चेतन कुमार की तीन शादियां, अलग-अलग रिश्तों की पृष्ठभूमि और भावनात्मक अस्थिरता — सब कुछ अब scrutiny में है। खुद पहली पत्नी ने माना कि बच्चियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
Mobile Addiction या Mental Pressure?
छह महीने पहले दिए गए दो मोबाइल फोन अब जांच का अहम हिस्सा हैं। पुलिस को मिला 8 पन्नों का सुसाइड नोट, जिसमें Korean games और culture के प्रति लगाव का ज़िक्र है। लेकिन सवाल ये है क्या मोबाइल वजह था या सिर्फ एक escape? क्या बच्चियां help मांग रही थीं, लेकिन सुनी नहीं गईं?

सिस्टम पर सवाल, बच्चियों पर नहीं
यह मामला हमें याद दिलाता है कि children mental health कोई luxury नहीं, necessity है। Parents, schools और society तीनों की collective responsibility है। यह tragedy किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि systemic neglect का नतीजा लगती है।
पुलिस ने साफ किया है कि जांच हर एंगल से जारी है और किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले सभी पहलुओं को जोड़ा जाएगा।
बिना PM के जवाब ही पास हो गया धन्यवाद प्रस्ताव, संवाद Out of Service
