
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की हालिया औचक भारत यात्रा का असर अब दक्षिण एशिया की राजनीति में साफ दिखने लगा है।
दिल्ली दौरे के कुछ ही दिनों बाद, UAE ने इस्लामाबाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के संचालन की योजना से खुद को अलग कर लिया है।
यह वही डील थी, जिस पर 2025 से पाकिस्तान और UAE के बीच बातचीत चल रही थी। अब अचानक पीछे हटना—इत्तेफाक कम, संकेत ज्यादा माना जा रहा है।
एयरपोर्ट डील क्यों टूटी?
पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, UAE ने इस प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए हैं। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे political decision नहीं कहा गया, लेकिन regional power equations इसकी कहानी खुद बयान कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान का सऊदी अरब के करीब जाना, रियाद के साथ डिफेंस डील, और सऊदी–तुर्की के साथ मिलकर तथाकथित ‘Islamic NATO’ की परिकल्पना UAE के लिए comfort zone से बाहर की बातें हैं।
सऊदी–UAE तनाव की छाया
कभी सबसे करीबी सहयोगी रहे UAE और सऊदी अरब, अब कई मोर्चों पर असहमत दिख रहे हैं। यमन युद्ध में अलग-अलग गुटों को समर्थन देने से लेकर क्षेत्रीय नेतृत्व की होड़ तक, दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है।
ऐसे में पाकिस्तान का खुलकर रियाद के पाले में जाना— अबू धाबी को पसंद नहीं आया, और इस्लामाबाद एयरपोर्ट डील इसका पहला casualty बनती दिख रही है।
भारत के साथ UAE की नई रणनीति
पाकिस्तान से दूरी के उलट, भारत के साथ UAE के रिश्ते नई ऊंचाई पर पहुंचते दिख रहे हैं। दिल्ली यात्रा के बाद, शेख मोहम्मद बिन जायद ने 900 भारतीय कैदियों की रिहाई को मंजूरी दी— जिसे diplomacy में strong goodwill signal माना जा रहा है।

इसके साथ ही, नई defence agreements, strategic cooperation, और long-term economic partnership
भारत–UAE रिश्तों को सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि strategic alliance की दिशा में ले जा रहे हैं।
पाकिस्तान के लिए डबल झटका
एक तरफ आर्थिक संकट, दूसरी तरफ खाड़ी देशों में घटता भरोसा— इस्लामाबाद के लिए यह फैसला सिर्फ एक डील का नुकसान नहीं, बल्कि diplomatic warning bell है।
कभी UAE पाकिस्तान का बड़ा ट्रेड पार्टनर था। आज वही UAE, भारत को preferred strategic partner मानता दिख रहा है।
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