सिर पर जलता दीया और छेदों वाला मटका लेकर क्यों नाचती हैं बिहार की महिलाएं? सदियों पुरानी है झिझिया की परंपरा

बिहार: लोक संस्कृति और परंपराओं के लिए मशहूर बिहार में झिझिया एक खास लोक नृत्य है, जिसे नवरात्र के दौरान प्रमुखता से किया जाता है। इस नृत्य में महिलाएं सिर पर कई छेदों वाला मटका रखती हैं, जिसके अंदर जलता हुआ दीया होता है। देखने में अनोखी लगने वाली यह परंपरा सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे लोक आस्था और मान्यताओं की दिलचस्प कहानी भी जुड़ी है।

झिझिया का संबंध बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र से माना जाता है। इस लोक नृत्य को मां दुर्गा की आराधना और परिवार की सुख-समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि महिलाएं अपने बच्चों को बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों से बचाने की कामना के साथ यह नृत्य करती हैं।

क्या है झिझिया नृत्य का इतिहास?

झिझिया की परंपरा को सदियों पुराना माना जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, इसकी शुरुआत आठवीं या नौवीं सदी में हुई थी। यह नृत्य मां दुर्गा और ब्रह्म बाबा को समर्पित माना जाता है। लोक विश्वास के मुताबिक, महिलाएं परिवार और बच्चों की सुरक्षा की कामना से झिझिया करती हैं। इसे बुरी नजर और काले जादू जैसी नकारात्मक शक्तियों से बचाव की परंपरा से भी जोड़कर देखा जाता है।

क्या है झिझिया नृत्य की सबसे खास बात?

झिझिया की सबसे बड़ी पहचान सिर पर रखा जाने वाला छेदों वाला मटका है। इसमें कई छोटे-छोटे छेद किए जाते हैं और अंदर दीया जलाकर इसे सजाया जाता है। महिलाएं इस मटके को सिर पर संतुलित रखते हुए नृत्य करती हैं।

लोक मान्यता है कि अगर कोई डायन मटके के छेदों को गिन ले, तो नृत्य करने वाली महिला की मृत्यु हो सकती है। इसी विश्वास के कारण मटके में बहुत सारे छोटे छेद बनाए जाते हैं, ताकि उन्हें गिनना मुश्किल हो। यह मान्यता इस लोक नृत्य को दूसरी पारंपरिक नृत्य शैलियों से अलग पहचान देती है।

झिझिया के दौरान पारंपरिक लोकगीत भी गाए जाते हैं। इन गीतों की धुन पर महिलाएं तालमेल के साथ नृत्य करती हैं। गीत और संगीत इस परंपरा का अहम हिस्सा हैं।

कैसे किया जाता है झिझिया नृत्य?

झिझिया आमतौर पर समूह में किया जाता है। महिलाएं शाम के समय एक जगह एकत्र होती हैं और पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य करती हैं। वे साड़ी पहनती हैं, जिसका पल्ला आगे की ओर रखा जाता है। इसके साथ पारंपरिक गहने भी पहने जाते हैं।

नृत्य के लिए छेदों वाले मटके को सजाकर उसमें दीया जलाया जाता है। इसके बाद महिलाएं उसे सिर पर रखकर लोकगीतों और वाद्य यंत्रों की धुन पर घूमते हुए नृत्य करती हैं। इस दौरान जलते दीये वाले मटके को सिर पर संतुलित बनाए रखना भी नृत्य का खास हिस्सा होता है।

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