SC का सख्त संदेश: Kuldeep Sengar को नहीं मिलेगी जमानत

गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

उन्नाव रेप केस में दोषी करार दिए जा चुके पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें सेंगर को सजा निलंबन के साथ जमानत दी गई थी। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि फिलहाल कुलदीप सेंगर को जमानत नहीं मिलेगी

यह आदेश CBI द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद दिया गया है।

Vacation Bench में हुई सुनवाई

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की अवकाशकालीन पीठ (Vacation Bench) कर रही है, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत कर रहे हैं।
पीठ में शामिल हैं:

  • जस्टिस जे.के. माहेश्वरी
  • जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह

कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर तत्काल रोक लगा दी।

CBI की दलील: “Serious Crime, No Leniency”

CBI की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के सामने सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि

  • घटना के समय पीड़िता की उम्र 16 साल से कम थी
  • यह अपराध सबसे गंभीर श्रेणी में आता है
  • ऐसे मामलों में सजा निलंबन न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है

SG ने साफ कहा कि अपील लंबित होने का मतलब यह नहीं कि दोषी को राहत दे दी जाए।

IPC Sections और सख्त सजा का प्रावधान

CBI ने कोर्ट को बताया कि ट्रायल कोर्ट ने कुलदीप सेंगर को IPC की धारा 376 के तहत दोषी ठहराया है।

  • धारा 376(1): न्यूनतम 10 साल, अधिकतम उम्रकैद
  • धारा 376(2): न्यूनतम 20 साल, अधिकतम जैविक जीवन के अंत तक कारावास

पीड़िता के नाबालिग होने के कारण यह मामला और भी कठोर सजा की श्रेणी में आता है।

Delhi HC ने क्यों दी थी राहत?

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि

  • कुलदीप सेंगर 7 साल से अधिक समय से जेल में है
  • उसकी अपील की सुनवाई में लगातार देरी हो रही है
  • अब तक 7 बार सुनवाई टल चुकी है

इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने सजा निलंबित कर सशर्त जमानत दी थी।

CBI का बड़ा एंगल: पिता की हत्या का मामला

CBI ने यह भी कोर्ट के सामने रखा कि सेंगर के खिलाफ पीड़िता के पिता की हत्या से जुड़ा मामला भी दर्ज है। उस मामले में भी उसकी अपील लंबित है।

ऐसे में आरोपी को जमानत देना

“न्याय और पीड़िता की सुरक्षा — दोनों के लिए खतरा हो सकता है।”

पीड़िता परिवार का विरोध

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद पीड़िता के परिवार, महिला अधिकार संगठनों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया था। उनका कहना था कि इस तरह की राहत “महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराधों पर गलत संदेश देती है।” 

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