
बांग्लादेश की सियासत में शपथ ग्रहण से पहले ही टकराव की पटकथा लिखी जा चुकी थी। तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार के शपथ लेने से ठीक पहले, अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस ने एक बड़ा संवैधानिक दांव चलने की कोशिश की—‘Constitution Reform Council’ का प्रस्ताव।
लेकिन BNP ने शुरुआत में ही इस प्रस्ताव को “मनमानी” करार देते हुए खारिज कर दिया। संदेश साफ था “जनता ने हमें सांसद चुना है, सुधार परिषद का सदस्य नहीं।”
क्या था Constitution Reform Council का प्रस्ताव?
अंतरिम सरकार चाहती थी कि सभी नवनिर्वाचित सांसद एक शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करें, जिसके तहत वे ‘कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म काउंसिल’ के सदस्य बनते। इस परिषद का उद्देश्य चुनाव के साथ हुए रेफरेंडम के आधार पर संविधान में व्यापक संशोधन करना था।
लेकिन BNP का तर्क साफ है यह परिषद मौजूदा संविधान का हिस्सा नहीं है। पार्टी का कहना है कि संविधान में बदलाव संसद की बहस और जनमत संग्रह की प्रक्रिया से ही होना चाहिए, न कि किसी “extra-constitutional mechanism” से।
सियासी भाषा में कहें तो “रिफॉर्म के नाम पर रिमोट कंट्रोल मंजूर नहीं।”
BNP की दो टूक
BNP नेता सलाहुद्दीन अहमद ने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया कि पार्टी प्रमुख के निर्देश पर किसी भी सांसद को इस फॉर्म पर साइन न करने को कहा गया है। उनका तर्क था,“हमने संसद सदस्य के तौर पर शपथ ली है, किसी सुधार परिषद के लिए नहीं।”
यह बयान उस वक्त आया जब शपथ ग्रहण समारोह औपचारिक रूप से शुरू ही हुआ था। यानी पावर ट्रांसफर से पहले ही पॉलिटिकल पावर-प्ले शुरू।

शपथ समारोह की झलक
शपथ ग्रहण समारोह में तारिक रहमान अपनी पत्नी जुबैदा रहमान और बेटी ज़ाइमा रहमान के साथ पहुंचे। चीफ इलेक्शन कमिश्नर एएमएम नासिर उद्दीन ने सांसदों को शपथ दिलाई। भारत की ओर से ओम बिरला समारोह में शामिल हुए। उनके साथ विदेश सचिव विक्रम मिसरी भी मौजूद थे। बिरला ने सोशल मीडिया पोस्ट में इसे “दो लोकतांत्रिक देशों के रिश्तों का महत्वपूर्ण क्षण” बताया।
लोकतंत्र की वापसी या नया संवैधानिक संकट?
ढाका की गलियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों तक एक ही सवाल है क्या यह लोकतंत्र की मजबूती है या संविधान को लेकर नई जंग की शुरुआत?
एक तरफ यूनुस खेमे का दावा है कि सुधार परिषद देश को आधुनिक लोकतांत्रिक ढांचे की ओर ले जाएगी। दूसरी ओर BNP का कहना है कि किसी भी बदलाव की प्रक्रिया संवैधानिक और पारदर्शी होनी चाहिए।
“कुर्सी बदली है, लेकिन संविधान की किताब पर अभी भी बहस की बुकमार्क लगी हुई है।”
International Watch
दक्षिण एशिया की राजनीति पर नजर रखने वाले विश्लेषक मानते हैं कि यह टकराव सिर्फ संविधान का नहीं, बल्कि सत्ता के नैरेटिव का है। नई सरकार की पहली बड़ी परीक्षा अब संसद के भीतर होगी जहां हर संशोधन बहस, बहुमत और राजनीतिक संतुलन से गुजरेगा।
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