सुनो,अगर तुम्हारी पहचान तुम्हारे दिमाग से नहीं, तुम्हारी जाति से तय हो रही है, तो समझो कि समाज ने तुम्हें इंसान नहीं, फाइल बना दिया है। “जाति मेरे जूते की नाप है, दिमाग की नहीं” ये मैंने कोई नारा नहीं दिया। यह मानसिक आज़ादी का ऐलान है। जूते की नाप छोटी हो सकती है, बड़ी हो सकती है। बदल भी सकती है। लेकिन दिमाग? वह तो सीमाओं को तोड़ने के लिए बना है, उनमें कैद होने के लिए नहीं। युवाओं से सीधी बात तुम्हारी generation के पास इंटरनेट है, AI है,…
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सवर्ण + सोशल जस्टिस: विरोधाभास नहीं, वैचारिक विरासत
भारत में जाति को लेकर बहस अक्सर शोर में बदल जाती है, जहां पहचान को विचारधारा के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है। इसी माहौल में जब मैं कहता हूँ कि “मैं सवर्ण हूँ, लेकिन सोशल जस्टिस का कट्टर समर्थक हूँ”, तो उसे या तो अपवाद माना जाता है या संदेह की नजर से देखा जाता है। जबकि हकीकत इससे कहीं ज्यादा सीधी और संवैधानिक है। पहचान बनाम विचारधारा सवर्ण होना कोई वैचारिक प्रमाणपत्र नहीं है, मैं जन्मा ब्राहमण लेकिन पंडित नहीं हूँ क्योंकि मैं वेदपाठी नहीं हूँ। ठीक वैसे…
Read Moreमुस्लिम युवाओं के लिए ओपन लैटर- आपके लिए आपको ही आगे आना होगा
धर्म को कभी भी सियासत का हथियार नहीं बनाना चाहिए — यह बात सब जानते हैं, जिसे न सिर्फ़ मुसलमानों को, बल्कि पूरे समाज को सुनना चाहिए। कट्टरपंथी लोग युवाओं की तन्हाई और दर्द का फ़ायदा उठाकर उन्हें ग़लत रास्ते पर मोड़ देते हैं। और इस जहर का इलाज सिर्फ़ सरकार के पास नहीं है — बल्कि मौलवी, बुद्धिजीवी, शिक्षक, और परिवार के बड़ों को मिलकर करना होगा। “बेचारगी नहीं, भागीदारी में है इज़्ज़त” “मुस्लिम युवाओं को अपनी ताक़त बेचारगी में नहीं, बल्कि समाज की भागीदारी में दिखानी चाहिए।” युवा…
Read Moreभारत चाँद पर पहुँचा, पर दलितों को इंसान समझने से अब भी दूर!
भारत ने चाँद पर कदम रख दिए। वैज्ञानिकों की मेहनत और राष्ट्र का गौरव – हर जगह तारीफ़ हो रही है। लेकिन एक सवाल बार-बार कचोटता है – क्या यही वो देश है जहाँ अब भी किसी इंसान को सिर्फ उसकी जाति के आधार पर नीचा दिखाया जाता है? कोलकाता लॉ कॉलेज में छात्रा से गैंगरेप, आरोपी TMCP से जुड़ा पढ़े-लिखे समाज की चुप्पी क्यों? हम गर्व से कहते हैं कि हम “शिक्षित” हैं, आधुनिक हैं। लेकिन जब हमारे आस-पास दलितों को मंदिर में घुसने से रोका जाता है, शादी…
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