संसद शुरू होने वाली है… लेकिन आवाज़ कानून की नहीं, वेदों की गूंजी। दिलचस्प बात ये नहीं कि श्लोक बोला गया—खतरनाक ये है कि उसका मतलब आज की राजनीति से जोड़ा गया। और सबसे बड़ा सवाल—क्या ये सिर्फ शब्द हैं या आने वाले सत्ता समीकरण का ट्रेलर? दूसरी सुबह होती है, सूरज निकलता है… लेकिन इस बार ‘उषा’ संसद में उतरी। और जब सत्ता ‘उषा’ की बात करे, तो समझिए अंधेरे की पहचान हो चुकी है। लेकिन क्या ये रोशनी सच में महिलाओं तक पहुंचेगी, या सिर्फ भाषणों में चमकेगी?…
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