रामानंद सागर की “गीत” एक ऐसी फिल्म है जिसमें अगर आपने ध्यान न दिया तो लगता है, “अरे वाह, कितना मीठा संगीत!” लेकिन ध्यान दो, तो एहसास होता है कि संगीत के पीछे एक गहरी साजिश चल रही है। इसमें राजेन्द्र कुमार हैं – एक भोले-भाले चरवाहे बने हुए, माला सिन्हा हैं – मंच पर चमकती अदाकारा, और फिर आते हैं सुजीत कुमार – एक ऐसा कुँवर जो प्यार में बर्बाद नहीं, क्रिमिनल बन जाता है। म्यूजिकल लव स्टोरी जिसमें खून, धोखा और जुर्म भी है कमला, यानी माला सिन्हा,…
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मूवी रिव्यू “बरसात की रात” – जब बारिश से ज़्यादा अमन की शायरी में पानी था
1960 में आई फिल्म “बरसात की रात” वो फिल्म है जिसमें मोहब्बत, कव्वाली, ग़रीबी, अमीरी, और पापा की ना — सब कुछ था। और बारिश तो सिर्फ़ बहाना था… असली तुफ़ान तो अमन की शायरी और शबनम की निगाहों में था। बरसात के बहाने बेमौसम रोमांस अमान (भारत भूषण) है एक बेरोज़गार लेकिन बेइंतिहा टैलेंटेड उर्दू शायर। शबनम (मधुबाला) है एक रईस, जो उसकी शायरी की फैन है — बिना देखे ही आशिक़ हो जाती है। फिर आती है… एक तूफ़ानी बरसात की रात, जब दोनों मिलते हैं और मोहब्बत…
Read Moreशहीद (1965) रेट्रो रिव्यू: भगत सिंह पर बनी सबसे प्रामाणिक देशभक्ति फिल्म
“तिरंगा सिर पर, पगड़ी जट्टा सम्हाल रे!” — ये कोई मेटा-फोर्स डायलॉग नहीं, बल्कि 60s की वो देशभक्ति थी जो आज भी रोंगटे खड़े कर दे। असेंबली में बम और कैमरे में क्रांति शुरुआत होती है इंडिया के 1911 से — जहां भगत सिंह अपने चाचा अजित सिंह की गिरफ़्तारी देखता है और बचपन से ही क्रांति का Zoom-Call join कर लेता है। लाला लाजपत राय की मौत हो, या असेम्बली में धमाका, भगत सिंह की एंट्री हैट के साथ होती है — literally! और फिर आती है फांसी की…
Read Moreरेट्रो रिव्यू हकीकत : जब देशभक्ति और बलिदान के सीन गूंजे थे स्क्रीन पर
1964 में बनी “हकीकत”, एक ऐसी फिल्म थी जिसने न केवल युद्ध की कच्ची सच्चाई दिखायी, बल्कि भारतीय सैनिकों की वीरता, उनके बलिदान और संघर्ष को भी स्क्रीन पर जीवंत किया। अगर आप सिनेमा के शौकिन हैं और अभी तक “हकीकत” नहीं देखी, तो मानो आप बॉलीवुड के उस खास दौर से अंजान हैं, जब हर फिल्म एक ज़िंदगी के रूप में बनती थी। फिल्म का संघर्ष: युद्ध या तो आप जीतते हैं, या फिर एक नई कहानियाँ बनाते हैं! चेतन आनंद द्वारा निर्देशित इस फिल्म की कहानी 1962 के…
Read MoreSuraj (1966) Movie Review: राजेंद्र कुमार की आखिरी सुपरहिट
टी. प्रकाश राव के निर्देशन में बनी फिल्म ‘सूरज’, राजसी प्रेम कहानी को उस दौर की मसालेदार बॉलीवुड स्टाइल में परोसती है। यहाँ नायक सूरज सिंह (राजेंद्र कुमार) सिर्फ दिल चुराता नहीं, बल्कि राजकुमारी भी चुरा लेता है – वो भी घोड़े पर बैठकर, जैसे हॉलीवुड और राजश्री की फिल्मों में होता है। कथानक: कौन राजकुमार, कौन डाकू? राजकुमार प्रताप की गद्दी पर बैठा है वो, जो असल में संग्राम सिंह का बेटा है! और असली राजकुमारी को डाकू सूरज उठा ले जाता है — बस यहीं से शुरू होती…
Read Moreरेट्रो रिव्यू: दोस्ती (1964) – जब दोस्ती में रोना गारंटी था
1964 की फिल्म दोस्ती कोई फिल्म नहीं, एक एंटीक इमोशनल तोप थी, जो हर दर्शक की आंखों पर डायरेक्ट हमला करती थी। इस फिल्म को देखकर ऐसा लगता था जैसे डायरेक्टर ने कह दिया हो, “भाई, जो नहीं रोया, उसे टिकट फ्री!” प्लॉट या इमोशनल जाल? कहानी दो दोस्तों की है – एक अंधा, दूसरा लंगड़ा। सुनने में लगेगा कि ये कोई अस्पताल की दोस्ती है, पर नहीं – ये उस जमाने की स्क्रिप्ट है जब इमोशन का मीटर ऑटोमैटिक हायपर पर था। हर सीन में या तो किसी का…
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