
सुप्रीम कोर्ट में सोनम वांगचुक की हिरासत को लेकर ज़ोरदार बहस देखने को मिली। उनकी पत्नी गीतांजलि द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई पर तीखे सवाल खड़े किए।
सिब्बल ने न केवल हिरासत के आधार बताने में 28 दिन की देरी को कानून का उल्लंघन बताया, बल्कि सोनम वांगचुक के शांतिपूर्ण भाषण की तुलना सीधे महात्मा गांधी के सत्याग्रह से कर दी। मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी।
‘हिरासत का आधार नहीं बताया गया’ — Kapil Sibal
कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा “कानून बिल्कुल साफ है—अगर हिरासत के सभी आधार समय पर नहीं बताए जाते, तो detention order अपने-आप रद्द हो जाता है।”
उन्होंने बताया कि 29 सितंबर को सोनम को डिटेंशन ऑर्डर दिया गया। लेकिन पूरे आधार 28 दिन बाद बताए गए। चार अहम वीडियो, जो हिरासत के समर्थन में बताए गए, न तो उसी दिन दिए गए, न पेनड्राइव में थे।
सिब्बल ने कहा कि सिर्फ लिंक देना कानून की शर्त पूरी नहीं करता। कानून कहता है कि अगर supporting documents नहीं दिए गए, तो हिरासत अवैध मानी जाएगी।
वीडियो, पेनड्राइव और कानून की खामोशी
सुनवाई में यह भी सामने आया कि 5 अक्टूबर को एक लैपटॉप दिया गया। लेकिन 29 सितंबर को दी गई पेनड्राइव में चारों वीडियो मौजूद नहीं थे। सिब्बल ने तर्क दिया कि यह Due Process of Law का खुला उल्लंघन है।
‘गांधी के रास्ते पर थे सोनम’
कपिल सिब्बल ने चौरी-चौरा कांड का जिक्र करते हुए कहा, “जैसे हिंसा के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस लिया था, वैसे ही सोनम वांगचुक ने हिंसा की खबर मिलते ही भूख हड़ताल खत्म कर दी।”
कोर्ट को सोनम वांगचुक का भाषण वीडियो भी दिखाया गया, जिसमें वे साफ कहते दिखे, वे हिंसा के खिलाफ हैं पत्थर, तीर या टकराव से बदलाव नहीं चाहते।

इसके बावजूद प्रशासन ने यह मान लिया कि “अगर हिरासत में न लिया गया तो हिंसा जारी रहेगी” जबकि सिब्बल के मुताबिक इरादा बिल्कुल उल्टा था।
भाषण बनाम डिटेंशन ऑर्डर
सिब्बल ने कहा, भाषण का लहजा न तो राज्य की सुरक्षा के खिलाफ था न ही राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध लेकिन Detention Order में इसके ठीक उलट बातें लिखी गईं।
यानी सवाल ये नहीं कि सोनम ने क्या कहा, सवाल ये है कि उनकी बातों को कैसे समझा (या समझाया) गया।
‘यह अकेले का फैसला नहीं था’
कपिल सिब्बल ने साफ किया कि भूख हड़ताल का फैसला पूरे संगठन का था। सोनम ने इसे गांधीवादी सत्याग्रह की भावना से स्वीकार किया उनका संदेश था “हम खुद भूखे रहेंगे, लेकिन किसी और को परेशान नहीं करेंगे। लद्दाख को अहिंसा का उदाहरण बनाएंगे।”
लोकतंत्र में डर किससे?
अगर शांत भाषण भी खतरा है, अहिंसक आंदोलन भी डराता है, तो सवाल उठता है— लोकतंत्र मजबूत है या बहुत ज़्यादा नर्वस?
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