पाकिस्तान का भारत पर ‘एयर अटैक’ वाला आरोप या सियासी स्टंट?

Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

सीमा पर गोलियों की आवाज अब सिर्फ सैनिकों तक सीमित नहीं रही—यह अब टीवी स्टूडियो, प्रेस कॉन्फ्रेंस और डिजिटल नैरेटिव तक पहुंच चुकी है। पाकिस्तान का नया आरोप सुनकर ऐसा लगता है जैसे जंग सिर्फ जमीन पर नहीं, बल्कि दिमागों और धारणा की लड़ाई बन चुकी है।

ड्रोन की भनभनाहट के बीच एक और ‘स्टोरी’ उड़ाई गई—भारत पर तालिबान को हथियार देने का इल्जाम। सबूत? खामोशी। लेकिन शोर इतना कि सच दब जाए।

पाकिस्तान का आरोप: ड्रोन या ‘डायवर्जन पॉलिटिक्स’?

पाकिस्तानी सेना के DG-ISPR ने दावा किया कि अफगान तालिबान के पास जो ड्रोन हैं, वो “भारतीय मूल” के हैं। यह आरोप जितना गंभीर है, उतना ही खाली भी—क्योंकि इसके समर्थन में कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया।

यानी कहानी वही पुरानी—जब अंदर हालात बिगड़ें, तो बाहर दुश्मन गढ़ लो। सवाल यह है कि क्या यह असली खतरे से ध्यान हटाने की कोशिश है?

तालिबान का पलटवार: ‘हम NATO से नहीं डरे, तुमसे क्या डरेंगे’

ईद के मौके पर कंधार में तालिबान सुप्रीम लीडर Hibatullah Akhundzada ने पाकिस्तान को बिना नाम लिए जो संदेश दिया, वह सीधा और ठंडा वार था।

उन्होंने कहा— “हम 20 साल तक NATO और पश्चिमी ताकतों के सामने नहीं झुके, अब किसी धमकी से डरने वाले नहीं हैं।”

यह बयान सिर्फ जवाब नहीं, बल्कि ताकत का प्रदर्शन था—और शायद चेतावनी भी।

ऑपरेशन, हमले और ‘खून का हिसाब’

पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन गजब लिल-हक’ शुरू किया, लेकिन ईद के चलते ब्रेक लेना पड़ा। हालांकि, जमीन पर हालात ब्रेक नहीं हुए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हालिया हमलों में भारी जान-माल का नुकसान हुआ। एक अस्पताल पर हमले में सैकड़ों लोगों की मौत की खबर ने हालात को और विस्फोटक बना दिया।

सरकारी बयान आते हैं, खारिज होते हैं, और फिर नए आरोप जुड़ जाते हैं। सच्चाई बीच में कहीं दम तोड़ती दिखती है।

भारत क्यों खींचा जा रहा है इस जंग में?

यह सवाल सबसे बड़ा है। भारत सीधे इस संघर्ष का हिस्सा नहीं, फिर भी उसका नाम बार-बार उछाला जा रहा है। जियोपॉलिटिक्स के जानकार इसे “Narrative Warfare” बताते हैं—जहां असली लड़ाई जमीन से ज्यादा perception की होती है।

यह वही खेल है जहां आरोप हथियार बनते हैं और सुर्खियां गोलियां।

‘जब सबूत न हो, तो स्क्रिप्ट लिख लो’

अगर आरोपों से जंग जीती जाती, तो दुनिया में हथियारों की जरूरत ही नहीं पड़ती। यह पूरा घटनाक्रम ऐसा लगता है जैसे “स्क्रिप्ट पहले लिखी गई, फिर घटनाएं उसके हिसाब से फिट की गईं।”

कभी ड्रोन, कभी साजिश, कभी गठजोड़—लेकिन हर कहानी में एक चीज कॉमन है: कन्फ्यूजन।

जंग लंबी, सच छोटा

सरहद पर तनाव चरम पर है। बयानबाजी का तापमान और ज्यादा है। लेकिन इस पूरे शोर में सबसे ज्यादा नुकसान किसका हो रहा है?
आम लोगों का—जो न ड्रोन जानते हैं, न डिप्लोमेसी। उनके लिए जंग का मतलब सिर्फ डर, नुकसान और अनिश्चितता है।

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