केरल में ‘13 नंबर’ का डर! मंत्री नहीं लेना चाहते इस नंबर की कार, मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा

तिरुवनंतपुरम: केरल की नई सरकार के गठन के बाद मंत्रियों के विभागों का बंटवारा तो हो गया, लेकिन सचिवालय के भीतर एक पुराना विवाद फिर चर्चा में आ गया है। राज्य सरकार की कैबिनेट में शामिल कोई भी मंत्री 13 नंबर वाली सरकारी कार इस्तेमाल करने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि एक बार फिर ‘13 नंबर’ को लेकर अंधविश्वास और राजनीति पर बहस तेज हो गई है।

कांग्रेस नीत यूडीएफ सरकार बनने के बाद जब मंत्रियों को सरकारी गाड़ियों का आवंटन शुरू हुआ, तब 1 से 12 नंबर तक की गाड़ियों को लेकर किसी मंत्री ने कोई आपत्ति नहीं जताई। लेकिन जैसे ही 13 नंबर वाली कार की बारी आई, कई मंत्रियों ने पहले ही इसे लेने से इनकार कर दिया। परंपरा के मुताबिक 1 नंबर की कार मुख्यमंत्री वीडी सतीशन को दी गई, जबकि बाकी गाड़ियां अन्य मंत्रियों में बांटी गईं।

सालों पुराना है ‘13 नंबर’ का विवाद

केरल सचिवालय में 13 नंबर वाली कार को लेकर यह स्थिति पहली बार नहीं बनी है। पिछले कई वर्षों से मंत्री इस नंबर की गाड़ी लेने से बचते रहे हैं। पहले तो हालात ऐसे थे कि 13 नंबर को पूरी तरह छोड़कर ही गाड़ियों का आवंटन किया जाता था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई मंत्री इस नंबर को अशुभ मानते हैं और इसी वजह से इसका इस्तेमाल करने से कतराते हैं। यही कारण है कि हर नई सरकार के गठन के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आ जाता है।

लेफ्ट सरकार के दौर में भी बना था मुद्दा

दिलचस्प बात यह है कि खुद वामपंथी दलों की सरकार के समय भी यह अंधविश्वास खत्म नहीं हुआ था। वर्ष 2016 में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार बनने के बाद भी कोई मंत्री 13 नंबर वाली कार लेने को तैयार नहीं हुआ था। उस समय बीजेपी ने इसे लेकर लेफ्ट नेताओं पर निशाना साधा था।

हालांकि बाद में तत्कालीन वित्त मंत्री थॉमस आइजैक ने उस गाड़ी का इस्तेमाल करने की सहमति दी थी। इससे पहले वीएस अच्युतानंदन सरकार के दौरान पूर्व मंत्री एमए बेबी ने भी अंधविश्वास को गलत साबित करने के लिए स्वेच्छा से 13 नंबर वाली कार ली थी।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

यह मामला सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि केरल जैसे शिक्षित और प्रगतिशील राज्य में जनप्रतिनिधि आखिर अंधविश्वास से क्यों प्रभावित हो रहे हैं।

कई यूजर्स का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में बैठे नेताओं को वैज्ञानिक सोच और तार्किकता का संदेश देना चाहिए, न कि किसी नंबर को अशुभ मानकर उससे दूरी बनानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है मामला

13 नंबर को लेकर विवाद सिर्फ सरकारी गाड़ियों तक सीमित नहीं रहा। केरल हाईकोर्ट में भी कमरों की नंबरिंग के दौरान 13 नंबर छोड़ दिया गया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि हाईकोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था को अंधविश्वास से प्रभावित नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर नाराजगी जताई थी और अंधविश्वास को बढ़ावा देने को लेकर केरल हाईकोर्ट को फटकार लगाई थी।

 

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