5 मिनट की गोलियों ने बृजेश का 22 साल तक पीछा नहीं छोड़ा- अब सबूत नहीं

महेंद्र सिंह
महेंद्र सिंह

लखनऊ के कैंट इलाके की वो ठंडी जनवरी की शाम… सायरन नहीं, गोलियों की आवाज गूंज रही थी। सड़क पर दौड़ती गाड़ियां अचानक थम गई थीं… और हवा में सिर्फ एक सवाल था—ये सियासत है या गैंगवार?

अब, पूरे 22 साल बाद, अदालत ने जैसे उस धुएं को हटाया है… और कहा है—“सबूत नहीं हैं।”

Brijesh Singh… बरी। लेकिन सवाल? अभी भी जिंदा हैं।

कोर्ट का फैसला: ‘सबूत नहीं, सजा नहीं’

लखनऊ की MP-MLA कोर्ट ने 2004 के चर्चित कैंट फायरिंग केस में बड़ा फैसला सुनाते हुए Brijesh Singh समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने साफ कहा—इतने सालों में पेश किए गए गवाह और साक्ष्य आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

यानी जिस केस ने कभी यूपी की राजनीति हिला दी थी, वो अब “कमजोर सबूतों” के बोझ तले खत्म हो गया।

13 जनवरी 2004: जब सड़क बनी ‘वॉर जोन’

कहानी की शुरुआत होती है 13 जनवरी 2004 से जगह—लखनऊ कैंट, सदर रेलवे क्रॉसिंग।

एक तरफ—Mukhtar Ansari
दूसरी तरफ—Krishnanand Rai

दोनों काफिले आमने-सामने। पहचानऔर फिर—फायरिंग।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक करीब 5 मिनट तक गोलियां चलीं, कई राउंड फायर हुए, पूरा इलाका दहशत में डूब गया। खून नहीं बहा लेकिन राजनीति का तापमान उबल पड़ा।

क्रॉस FIR: सच या सियासी चाल?

घटना के तुरंत बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ FIR दर्ज कराई। हत्या के प्रयास, बलवा, आपराधिक षड्यंत्र। ये सिर्फ केस नहीं था
ये सियासत बनाम अपराध का ओपन फाइल था।

लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए गवाह कमजोर होते गए, और केस ढहता चला गया।

बृजेश सिंह: किताबों से बंदूक तक का सफर

Brijesh Singh की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं।

  • पढ़ाई में तेज
  • इंटर में टॉप
  • BSc छात्र

लेकिन 1984 में पिता की हत्या और यहीं से कहानी पलटी। “किताब” छूटी “बंदूक” उठी। पहले बदला फिर गैंग फिर पूरा नेटवर्क।

पूर्वांचल की गैंगवार: खून, कोयला और सत्ता

Mukhtar Ansari और बृजेश सिंह दो नाम, एक जंग। कोयले की ठेकेदारी से शुरू हुई दुश्मनी धीरे-धीरे पूर्वांचल की सबसे खूनी गैंगवार बन गई। हत्या, हमला, राजनीतिक संरक्षण, पुलिस दबाव यहां हर मोड़ पर सत्ता और अपराध का गठजोड़ दिखा।

राजनीति की शरण और गैंग का विस्तार

बृजेश सिंह ने राजनीति का सहारा लिया और Krishnanand Rai का समर्थन मिला। लेकिन ये समर्थन भी उन्हें गैंगवार से नहीं बचा पाया। पूर्वांचल से लेकर मुंबई तक नेटवर्क फैला। और फिर गिरफ्तारी, फरारी, फिर गिरफ्तारी।

कोर्ट में क्यों गिरा केस?

22 साल लंबा ट्रायल लेकिन आखिरकार केस क्यों गिरा?

संभावित वजहें गवाहों का मुकरना, साक्ष्यों की कमी, समय के साथ कमजोर होती फाइल। यही वजह बनी और कोर्ट ने कहा, “डाउट का फायदा आरोपियों को।”

ये सिर्फ एक बरी होने की खबर नहीं है ये एक सिस्टम की कहानी है।

जहां गोलियां तेज थीं। लेकिन जांच धीमी। राजनीति भारी थी लेकिन सबूत हल्के 22 साल बाद फैसला आया। लेकिन क्या इंसाफ भी आया?
ये सवाल अब भी सड़कों पर घूम रहा है।

लखनऊ कैंट फायरिंग केस अब कानूनी तौर पर खत्म हो चुका है। लेकिन जिस दिन गोलियां चली थीं, उस दिन जो डर पैदा हुआ था वो आज भी लोगों की यादों में जिंदा है। और शायद यही इस केस की सबसे बड़ी सच्चाई है।

Lucknow में ‘Street Culture’ का ब्लास्ट! 4500 sqm का Skate Park खुला

Related posts

Leave a Comment