दुश्मन आमने-सामने! 14 अप्रैल को वॉशिंगटन में Israel-Lebanon मीटिंग

साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

मिडिल ईस्ट में बारूद की गंध अभी हवा में है… लेकिन इसी धुएं के बीच एक उम्मीद की किरण भी दिखी है। दशकों से दुश्मन रहे Israel और Lebanon अब आमने-सामने बैठने जा रहे हैं—वो भी Washington D.C. में। सवाल ये है—क्या ये मीटिंग शांति लिखेगी या सिर्फ एक और कूटनीतिक फोटो-ऑप बनकर रह जाएगी?

दुश्मनी के बीच ‘डायरेक्ट टॉक’ का ब्रेकथ्रू

लंबे समय बाद दोनों देशों के बीच सीधे संपर्क की खबर सामने आई है। यह बातचीत फोन कॉल के जरिए शुरू हुई, जिसे United States ने संभव बनाया। इस कॉल में अमेरिकी राजदूत भी शामिल थे, जो साफ संकेत देता है कि वॉशिंगटन अब सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि गेम का रेफरी बन चुका है।

14 अप्रैल: वॉशिंगटन में हाई-वोल्टेज मीटिंग

14 अप्रैल को अमेरिकी विदेश विभाग में दोनों देशों के प्रतिनिधि आमने-सामने बैठेंगे। एजेंडा साफ है—सीजफायर का रोडमैप और आगे की बातचीत का ढांचा। लेकिन असली सवाल ये है कि क्या कागज पर बनने वाला ये प्लान जमीन पर भी टिक पाएगा?

क्यों ऐतिहासिक मानी जा रही है ये बैठक?

Israel और Lebanon के बीच कोई औपचारिक कूटनीतिक संबंध नहीं हैं। दोनों देश तकनीकी रूप से अब भी दुश्मन हैं। ऐसे में एक ही टेबल पर बैठना ही अपने आप में ‘ब्रेकिंग न्यूज’ नहीं, बल्कि ‘इतिहास’ है। कूटनीति अपनी जगह है… लेकिन जमीन पर तस्वीर अब भी डरावनी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक हमलों में करीब 2000 लोगों की जान जा चुकी है और हजारों घायल हैं। हाल ही में हुए हमलों में सैकड़ों लोगों की मौत ने साफ कर दिया है कि सीजफायर की बातें अभी सिर्फ कागज तक सीमित हैं।

सीजफायर पर भी कन्फ्यूजन!

मामला और उलझ गया है क्योंकि Israel का कहना है कि लेबनान किसी सीजफायर का हिस्सा नहीं है, जबकि Iran इसे शामिल बता रहा है। यानी जंग सिर्फ मिसाइलों से नहीं, बल्कि बयानबाजी से भी लड़ी जा रही है।

शांति या सिर्फ ‘डिप्लोमैटिक ड्रामा’?

वॉशिंगटन की यह बैठक मिडिल ईस्ट की दिशा तय कर सकती है। लेकिन इतिहास गवाह है—यहां हर समझौता कागज पर आसान और जमीन पर नामुमकिन रहा है। अब देखना ये है कि 14 अप्रैल शांति का दिन बनता है या फिर एक और ‘डिप्लोमैटिक शो’ साबित होता है।

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