
ईरान इस वक्त गृह अशांति (Civil Unrest) के सबसे खतरनाक दौर से गुजर रहा है। राजधानी तेहरान से लेकर तबरीज तक हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। नारे सीधे सत्ता के केंद्र पर हैं — “तानाशाही मुर्दाबाद”, “इस्लामिक रिपब्लिक मुर्दाबाद”।
हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि सरकार ने मोबाइल नेटवर्क बंद, इंटरनेट की लाइनें काट दीं। लेकिन गुस्से का नेटवर्क अब ऑफलाइन भी काम कर रहा है।
Violence Escalates: आग, पत्थर और आंसू गैस
बीती रात तेहरान में हालात उस वक्त बेकाबू हो गए जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश की। जवाब में उग्र भीड़ ने सरकारी बिल्डिंग्स में आग लगाई। सड़कों पर बैरिकेड्स तोड़े और Sun & Lion Flag लहराते हुए सत्ता को खुली चुनौती दी।
तबरीज में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच हिंसक झड़पें हुईं, जिसमें कई लोग घायल हुए।
Internet Shutdown: सरकार का पुराना हथियार
ईरानी सरकार ने वही किया जो हर डरती हुई सत्ता करती है — आवाज़ बंद करने के लिए नेटवर्क बंद।
लेकिन सवाल ये है, क्या इंटरनेट काटने से भूख, महंगाई और गुस्सा भी कट जाता है?
Death Toll & Arrests: Human Rights Alarm
अमेरिका स्थित Human Rights Activists News Agency के मुताबिक 28 दिसंबर से 8 जनवरी के बीच करीब 45 लोगों की मौत 3000 से ज्यादा गिरफ्तारियां 50 से अधिक शहरों में प्रदर्शन। ये सिर्फ आंकड़े नहीं, ये एक सिस्टम के खिलाफ उबलता हुआ लावा है।
Reza Pahlavi Factor: निर्वासित शहज़ादे की वापसी?
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद निर्वासित Crown Prince Reza Pahlavi ने हालात को हवा दे दी। उन्होंने खुली अपील की — “घर से बाहर निकलो, इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ खड़े हो जाओ”

इसके बाद ही प्रदर्शन और ज्यादा उग्र हो गए। ईरान की सड़कों पर अब सिर्फ नारे नहीं, राजनीतिक nostalgia भी दिख रहा है।
Economic Meltdown: असली वजह यही है
ईरान की अर्थव्यवस्था ICU में है:
- 1 डॉलर = 14 लाख ईरानी रियाल
- महंगाई आसमान पर
- नौकरियां गायब
- भविष्य धुंधला
लोग साफ कह रहे हैं — “ये सिर्फ राजनीति नहीं, पेट की लड़ाई है।”
Trump Warning: अमेरिका की एंट्री?
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दूसरी बार चेतावनी दी है- “अगर ईरानी सेना ने निर्दोष जनता पर जुल्म जारी रखा, तो अमेरिका दखल देगा।”
यह बयान ईरान के लिए सिर्फ चेतावनी नहीं, Geopolitical Alarm Bell है।
सत्ता बनाम सच्चाई
ईरान की सत्ता सोच रही है इंटरनेट बंद = विरोध खत्म, डर = कंट्रोल, सेना = समाधान लेकिन इतिहास कहता है — जब जनता सड़कों पर उतरती है, तो तख्त हिलते हैं।
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