टोल प्लाजा पर गुप्त सॉफ्टवेयर से करोड़ों की वसूली का खेल! ईडी ने 7 राज्यों में 14 ठिकानों पर मारा छापा

लखनऊ: राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के टोल प्लाजा पर अधिकृत प्रणाली के समानांतर कथित तौर पर दूसरा और अनधिकृत सॉफ्टवेयर चलाकर करोड़ों रुपये की टोल वसूली के मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने बड़ी कार्रवाई की है। ईडी के लखनऊ जोनल कार्यालय की टीम ने उत्तर प्रदेश के वाराणसी समेत सात राज्यों में कुल 14 ठिकानों पर छापेमारी की है। तलाशी के दौरान जब्त मोबाइल फोन, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की डिजिटल फोरेंसिक जांच में कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं।

जांच में टोल प्लाजा से जुड़े विशेष पोर्टल, उपयोगकर्ता पहचान, पासवर्ड, लेनदेन का ब्योरा और आपसी बातचीत के रिकॉर्ड मिलने की बात सामने आई है। अब एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि कथित समानांतर व्यवस्था के जरिए आधिकारिक खातों से कितनी रकम बाहर रखी गई और इससे किन-किन लोगों को फायदा मिला।

7 राज्यों में 14 ठिकानों पर तलाशी

ईडी की लखनऊ टीम ने वाराणसी के काजी सराय स्थित साईगांव में सॉफ्टवेयर डेवलपर आलोक कुमार सिंह के फ्लैट नंबर सी-106 पर तलाशी ली। इसके अलावा गुरुग्राम के सेक्टर-14 में शिवा बिल्डटेक प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक अशोक जैन के मकान नंबर 644 और सिविल लाइंस फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित कंपनी के दूसरे निदेशक रोहित गुप्ता के मकान पर भी कार्रवाई की गई।

इसके साथ ही राजस्थान, महाराष्ट्र, जम्मू, मध्य प्रदेश और कोलकाता में भी तलाशी ली गई। ईडी की कार्रवाई कुल 14 ठिकानों पर शुरू की गई।

टोल प्लाजा पर चल रही थी समानांतर व्यवस्था

ईडी के अनुसार, जांच में कुछ टोल प्लाजा पर अधिकृत इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह प्रणाली के साथ एक समानांतर और अनधिकृत व्यवस्था चलाए जाने के संकेत मिले हैं। इसके लिए Mobdata और Any नाम के सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है।

एजेंसी का दावा है कि डिजिटल फोरेंसिक जांच और एनएचएआई के रिकॉर्ड से इन सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल के संकेत मिले हैं। जांच में यह भी सामने आया कि टोल संचालन से जुड़े लोगों के बीच सॉफ्टवेयर के लॉगिन, पोर्टल और लेनदेन से संबंधित जानकारियां साझा की जाती थीं।

यूपी एसटीएफ ने जनवरी 2025 में किया था खुलासा

इस कथित टोल घोटाले का खुलासा 22 जनवरी 2025 को यूपी एसटीएफ ने मिर्जापुर के अतरैला टोल प्लाजा पर कार्रवाई के दौरान किया था। मामले में वाराणसी के सॉफ्टवेयर डेवलपर आलोक कुमार सिंह समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

एसटीएफ की शुरुआती जांच में सामने आया था कि यह सॉफ्टवेयर 42 टोल प्लाजा पर लगाया गया था। बाद में सामने आई जानकारी के मुताबिक इसे 200 से ज्यादा टोल प्लाजा पर स्थापित कर 100 करोड़ रुपये से अधिक का खेल किए जाने की बात कही गई।

ऐसे चल रहा था कथित वसूली का पूरा खेल

जांच एजेंसी के मुताबिक, जब कोई वाहन टोल प्लाजा से गुजरता था तो उसकी एंट्री और टोल रसीद अधिकृत प्रणाली के बजाय इन अनधिकृत सॉफ्टवेयर में दर्ज की जाती थी। वाहन चालक को रसीद मिल जाती थी, लेकिन उससे जुड़ी वसूली का रिकॉर्ड एनएचएआई की आधिकारिक प्रणाली तक नहीं पहुंचता था।

आधिकारिक व्यवस्था में जितनी टोल वसूली दर्ज होती थी, उससे अतिरिक्त रकम कथित तौर पर दूसरे सॉफ्टवेयर के माध्यम से दर्ज कर अलग रखी जाती थी। इससे टोल संग्रह का वास्तविक आंकड़ा कम दिखाई देता था और अतिरिक्त रकम सरकारी निगरानी से बाहर चली जाती थी।

फोरेंसिक जांच से जुटाए जा रहे सुराग

ईडी अब जब्त किए गए मोबाइल फोन, कंप्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की डिजिटल फोरेंसिक जांच के आधार पर पूरे नेटवर्क की पड़ताल कर रही है। एजेंसी यह जानने का प्रयास कर रही है कि अनधिकृत सॉफ्टवेयर के जरिए कितनी रकम का लेनदेन हुआ, आधिकारिक रिकॉर्ड से कितनी राशि बाहर रखी गई और इस कथित व्यवस्था में कौन-कौन लोग शामिल थे।

 

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