45 साल का राज खोल गई ‘धुरंधर’! सच देख बोलोगे – प्रोपोगंडा नहीं आईना है

आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)
आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)

एक फिल्म आई… और देश दो हिस्सों में बंट गया। किसी ने कहा “प्रोपोगंडा”, तो किसी ने कहा “सच्चाई का आईना”। लेकिन असली सवाल ये है — डर फिल्म से है या उसमें दिखाए गए सच से?

धुरंधर: फिल्म नहीं, फुल-ऑन बहस मशीन

Dhurandhar ने रिलीज होते ही थिएटर से ज्यादा सोशल मीडिया पर धुआं उड़ा दिया। कहानी में एक किरदार जमील जमाली… 45 साल से पाकिस्तान में। “भाई उस समय कौन सी सरकार थी?” फिल्म ने सिर्फ एक दौर नहीं… कई सरकारों को घसीट लिया। हमजा 15 साल पहले गया था तब Manmohan Singh का दौर भी दिखा, और Narendra Modi की नोटबंदी भी।

“जब फिल्म सबको बराबर धोती है, तो फिर प्रोपोगंडा का टैग किसे बचाने के लिए है?”

प्रोपोगंडा या पब्लिक का कन्फ्यूजन?

ट्रेंड चल पड़ा — “धुरंधर = प्रोपोगंडा” लेकिन मजेदार बात ये है…फिल्म में किसी एक पार्टी को टारगेट नहीं किया गया। सबका हिसाब बराबर! “यह सिर्फ फिल्म नहीं, पब्लिक के दिमाग का एक्स-रे है।”

जमील जमाली: किरदार या सवाल?

जमील जमाली का 45 साल पाकिस्तान में रहना…यह कहानी का ट्विस्ट नहीं, सिस्टम पर सवाल है। लोगों ने इसे राजनीति से जोड़ दिया…जैसे हर सीन में कोई एजेंडा छिपा हो। “किरदार fictional है, लेकिन सवाल 100% real हैं।”

अतीक वाला एंगल: असली ट्रिगर यही है?

अब आते हैं उस पॉइंट पर जहां बहस भड़कती है…फिल्म में एक सीन ऐसा आता है, जो सीधे real-life क्राइम स्टोरी की याद दिलाता है। और बस… यहीं से लोगों को “प्रोपोगंडा” नजर आने लगता है।

सिस्टम का आईना: फिल्म ने क्या दिखाया?

धुरंधर ने वो दिखाया, जो अक्सर न्यूज में भी आधा ही दिखता है— सत्ता बदलती है, सिस्टम नहीं। चेहरे बदलते हैं, कहानी वही रहती है। जनता हर बार spectator बनी रहती है। “जो सामने आया वो सिस्टम को नंगा कर देता है।”

सिनेमा vs सियासत: असली टकराव

आज का सिनेमा सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं…यह narrative war बन चुका है। हर फिल्म को अब ideology के चश्मे से देखा जाता है। “फिल्में अब कहानी नहीं सुनातीं, बहस पैदा करती हैं।”

क्योंकि हर दर्शक अपनी सोच लेकर थिएटर में जाता है। जो जैसा सोचता है…उसे वैसा ही दिखता है। “फिल्म वही है, लेकिन नजरिया अलग-अलग है।”

सच से डर या लेबल की आदत?

क्या हम हर असहज सच्चाई को “प्रोपोगंडा” कहकर खारिज कर देते हैं? या फिर सच में कुछ फिल्मों में एजेंडा होता है? “डर फिल्म से नहीं, अपने विचारों के टूटने से है।”

धुरंधर ने एक चीज साफ कर दी आज का दर्शक सिर्फ फिल्म नहीं देखता, वो उसमें अपनी राजनीति ढूंढता है। और यही सबसे बड़ा ट्विस्ट है। 
“जब हर आईना प्रोपोगंडा लगने लगे… तो समझ लो चेहरा नहीं, नजरिया बदलने की जरूरत है।”

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