कहते हैं, “रियल लाइफ में जो ड्रामा है, वो रीमेक की ज़रूरत नहीं छोड़ता”, और ऐसा ही कुछ हुआ राजा रघुवंशी हत्याकांड के साथ। एक हाई-प्रोफाइल मामला जो इंदौर से लेकर शिलांग तक सोशल मीडिया और न्यूज़ हेडलाइंस पर छाया रहा, अब बन रहा है बॉलीवुड फिल्म। डायरेक्टर ने बजाया क्लैपबोर्ड – बिना राइट्स नहीं कर रहे कोई “क्राइम सीन” डायरेक्टर एस.पी. निम्बावत, जो इससे पहले कई रियलिस्टिक फिल्में बना चुके हैं, अब “हनीमून इन शिलांग” के जरिए इस केस को पर्दे पर लाने वाले हैं।और नहीं! उन्होंने कोई चोरी-छिपे…
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आनंद मठ (1952) रेट्रो रिव्यू: संन्यासियों का विद्रोह और ‘वंदे मातरम्’ की गूंज
1952 की ऐतिहासिक फिल्म ‘आनंद मठ’ को सिर्फ एक “क्लासिक फिल्म” कहना उसके साथ अन्याय होगा। यह फिल्म एक धार्मिक-सांस्कृतिक क्रांति की सिनेमाई व्याख्या है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध बंगाली उपन्यास पर आधारित यह फिल्म संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि में आज़ादी की चिंगारी को एक नया चेहरा देती है। और हां, इसमें ‘साधु-संत’ सिर्फ प्रवचन नहीं, क्रांति का नेतृत्व करते हैं। रेट्रो सिनेमा के लिए इससे ज़्यादा metal कुछ नहीं हो सकता। कहानी में तप और ताव दोनों 18वीं शताब्दी का बंगाल। भूख, भय और फिरंगियों का आतंक। ऐसे…
Read Moreरेट्रो रिव्यू- अराउंड द वर्ल्ड – ‘फ्लाइट ऑफ फैंटेसी’ या टिकट की बर्बादी?
1967 में बनी ‘Around the World’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक यात्रा है लॉजिक से दूर और लोकेशन के करीब।राज कपूर, जो आमतौर पर क्लासिक्स के लिए जाने जाते हैं, इस फिल्म में लगते हैं जैसे उन्हें पासपोर्ट मिल गया और स्क्रिप्ट एयरपोर्ट पर ही छूट गई। कहानी: छुट्टी कम, गड़बड़ ज्यादा एक करोड़पति लड़का (राज कपूर), जापान पहुंचते ही 8 डॉलर के साथ इंटरनेशनल रोड शो पर निकल पड़ता है।वजह? उसका कर्मचारी उसके ट्रैवल प्लान का कबाड़ बना देता है।फिर क्या? राजू भाई क्रूज़ पर नौकरी पाते हैं…
Read Moreनिब्बे-निब्बियों की टूटती मोहब्बत और सोशल मीडिया का सैयारा साया
देश गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, लेकिन कुछ युवाओं की सबसे बड़ी समस्या ये है कि “सैयारा गाना बजते ही उनका दिल टूट जाता है!”मतलब? गुड्डे-गुड़िया की उम्र में लव लेटर, और ब्रेकअप के बाद स्टेटस में रंग बदलते इमोजी? हमारे टाइम पे सैयारा आता था तो टीवी बंद हो जाता था, अब सैयारा बजते ही Reels बन जाती है और निब्बा ज़मीन पर लोट जाता है! ये उम्र तो टॉफी छीनने की थी, न कि ट्रू लव की कसम खाने की 13 साल की उम्र में हम…
Read Moreरेट्रो रिव्यू- लव इन शिमला : जब नज़रें मिलीं तो रशियन भी मदहोश हो गए
1960 में आई “लव इन शिमला”, कोई साधारण फिल्म नहीं थी—यह वो मोड़ था जहाँ साधना की आंखें, जॉय की स्माइल, और शिमला की वादियां मिलकर रोमांस का तूफान ले आईं। निर्देशक आरके नैयर और निर्माता शशाधर मुखर्जी ने फिल्मालय के बैनर तले एक ऐसी रचना की जो उस दौर की लड़कियों को चूड़ी पहनने और लड़कों को टाई बाँधने पर मजबूर कर गई। साधना का डेब्यू: चश्मे के पीछे का चमत्कार फिल्म में साधना ने ‘सोनिया’ का किरदार निभाया—एक लड़की जिसे उसकी सौतेली माँ और चचेरी बहन ताने मार-मारकर…
Read Moreरेट्रो रिव्यू : “बरखा” — तड़पाओगे तड़पा लो, पर इस क्लासिक को मिस मत करो
1959 में जब जगदीप को हीरो बनाया गया, तो सिनेमा प्रेमियों ने भी हैरानी से छाता खोल लिया — “ये वही कॉमिक जगदीप हैं?” लेकिन बरखा में उन्होंने पारंपरिक हीरो के सारे गुण निभाए। सीरियस भी लगे और रोमांटिक भी। और वो सैलाब वाला सीन… तड़पाओगे तड़पा लो बस वही मूड था! नंदा: बारिश में भी भीगी नहीं, बस नज़रों से बहा ले गईं नंदा का रोल पार्वती के रूप में बेहद ग्रेसफुल है। सादगी, समर्पण और संस्कार के ऐसे पैकेज के साथ उन्होंने साबित किया कि बरखा सिर्फ मौसम…
Read Moreरेट्रो रिव्यू : ‘बिन फेरे हम तेरे’ – शादी के बिना भी पूरी ज़िंदगी का साथ
आशा पारेख ने जमुना के किरदार में ऐसा जान डाल दिया है कि लगेगा कि आपके मोहल्ले की कोई “कठिन ज़माने की औरत” बोल रही है।बेच दी गई, बंधक बनाई गई, और फिर भी बिना शादी के एक आदमी और उसके बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाई — जमुना संघर्ष की चलता-फिरता प्रतीक बन जाती हैं। रिश्तों का मेलोड्रामा: शादी नहीं, पर संस्कार पूरे! जमुना और जगदीश शर्मा (राजेंद्र कुमार) का रिश्ता बिना शादी के पति-पत्नी जैसा दिखाया गया है। ये फिल्म 70s की होते हुए भी एक “लिव-इन विद सेंटीमेंट्स” वाला…
Read Moreरेट्रो रिव्यू हकीकत : जब देशभक्ति और बलिदान के सीन गूंजे थे स्क्रीन पर
1964 में बनी “हकीकत”, एक ऐसी फिल्म थी जिसने न केवल युद्ध की कच्ची सच्चाई दिखायी, बल्कि भारतीय सैनिकों की वीरता, उनके बलिदान और संघर्ष को भी स्क्रीन पर जीवंत किया। अगर आप सिनेमा के शौकिन हैं और अभी तक “हकीकत” नहीं देखी, तो मानो आप बॉलीवुड के उस खास दौर से अंजान हैं, जब हर फिल्म एक ज़िंदगी के रूप में बनती थी। फिल्म का संघर्ष: युद्ध या तो आप जीतते हैं, या फिर एक नई कहानियाँ बनाते हैं! चेतन आनंद द्वारा निर्देशित इस फिल्म की कहानी 1962 के…
Read Moreधूल का फूल: “तू हिंदू बनेगा…” – जो धर्मनिरपेक्षता का नेशनल एंथम बन गया
1959 में जब बी.आर. चोपड़ा ने अपने छोटे भाई यश को डायरेक्शन की गद्दी सौंपी, तब शायद उन्होंने नहीं सोचा होगा कि हिंदी सिनेमा का सबसे संवेदनशील फिल्ममेकर पैदा हो रहा है — और वो भी एक ऐसी कहानी से, जिसमें बच्चा जंगल में साँप के साथ सेफ है, लेकिन समाज के बीच अनसेफ! धर्म, नैतिकता और ‘कुर्सी’ — कोर्ट में सब चुप! महेश कपूर (राजेंद्र कुमार) ने न सिर्फ प्रेमिका मीना को छोड़ा, बल्कि अपने बेटे को भी जंगल में फेंक दिया। लेकिन VIP बनकर लौटे तो “जज साहब”…
Read MoreOTT की ULLU, ALTT कट गई, अब कंटेंट का ‘संस्कार संस्करण’ लोड होगा
भारत सरकार ने 25 OTT मोबाइल ऐप्स और वेबसाइट्स पर प्रतिबंध लगा दिया है। कारण? कंटेंट ऐसा कि परिवार में गलती से ऑन हो जाए तो टीवी भी खुद को ऑफ कर ले!सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अश्लील और महिला-विरोधी कंटेंट परोसने वाले इन प्लेटफॉर्म्स पर आईटी एक्ट की छड़ी चला दी है। आदेश में क्या कहा गया? मंत्रालय का कहना है कि ये ऐप्स न सिर्फ अश्लील कंटेंट दिखा रहे थे, बल्कि “डिजिटल मर्यादा” को धूल चटवा रहे थे।IT Act 2000, IT Rules 2021, भारतीय न्याय संहिता की धारा…
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