
असम में 2026 के विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। दिल्ली में कांग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में 40 सीटों के उम्मीदवारों को हरी झंडी मिल गई है। सबसे ज्यादा चर्चा असम कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद Gaurav Gogoi की संभावित उम्मीदवारी को लेकर है। सूत्रों के मुताबिक वे जोरहाट विधानसभा क्षेत्र से चुनावी मैदान में उतर सकते हैं।
राजनीति में संकेत ही सुर्खी बन जाते हैं और यहां संकेत साफ है कि कांग्रेस इस बार “चेहरे” के साथ लड़ाई लड़ना चाहती है।
दिल्ली की मीटिंग, गुवाहाटी की रणनीति
दिल्ली में हुई बैठक सिर्फ औपचारिकता नहीं थी। पार्टी के सीनियर लीडर्स ने सीट-दर-सीट फीडबैक लिया। वहीं केरल पर भी फोकस बरकरार है।
1 मार्च को दिल्ली में केरल कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक होगी। एआईसीसी स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष Madhusudan Mistry उम्मीदवार चयन प्रक्रिया को लीड करेंगे। मतलब साफ है कांग्रेस इस बार “रैंडम एक्सपेरिमेंट” नहीं, बल्कि “डेटा-ड्रिवन पॉलिटिक्स” का दावा करना चाहती है।
BJP की ‘जन आशीर्वाद यात्रा’: ग्राउंड कनेक्ट या ग्राउंड टेस्ट?
उधर बीजेपी ने भी चुनावी इंजन स्टार्ट कर दिया है। असम विधानसभा चुनाव 2026 को देखते हुए पार्टी की राज्य इकाई ‘जन आशीर्वाद यात्रा’ लेकर मैदान में उतर रही है।
आज असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma ढेकियाजुली स्थित गुप्तेश्वर देवालय से यात्रा का शुभारंभ करेंगे।
बीजेपी सांसद Pradan Baruah का कहना है कि यात्रा का मकसद जनता के बीच जाकर “आशीर्वाद” लेना और पिछले 10 वर्षों के काम का रिपोर्ट कार्ड पेश करना है।
सवाल यह है क्या यह “आशीर्वाद यात्रा” है या “एंटी-इंकंबेंसी टेस्ट ड्राइव”?

आशीर्वाद बनाम असंतोष
भारतीय राजनीति में यात्रा शब्द बड़ा लचीला है। कभी रथ यात्रा, कभी परिवर्तन यात्रा, अब आशीर्वाद यात्रा।
चुनाव से पहले हर दल जनता के दरवाजे पर दस्तक देता है, मतदाता मुस्कुराता है, चाय पिलाता है, फोटो खिंचवाता है…और फिर वोटिंग मशीन पर अपनी असली राय देता है। असम में इस बार मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, नैरेटिव का भी है। एक तरफ कांग्रेस “नए चेहरे + संगठन रीबूट” का दावा कर रही है, दूसरी तरफ बीजेपी “डिलीवरी + डेवलपमेंट” का कार्ड खेल रही है।
केरल पर भी नज़र
असम के साथ-साथ कांग्रेस की रणनीतिक नज़र केरल पर भी टिकी है। स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक से साफ है कि पार्टी दक्षिण में भी संतुलन साधने की कोशिश कर रही है। राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय संतुलन ही असली गणित है जहां एक सीट हारने का मतलब संसद में एक आवाज कम होना है।
चुनावी मौसम की पहली गरज
असम की सियासत में अभी सिर्फ बादल गरजे हैं, बारिश बाकी है। कांग्रेस ने मोहरे सजाए हैं, बीजेपी ने मैदान नापा है। अब असली सवाल क्या 2026 में “गोगोई फैक्टर” चलेगा या “आशीर्वाद नैरेटिव” भारी पड़ेगा?
राजनीति में कुछ भी फाइनल नहीं होता, सिवाय इस सच के कि हर चुनाव से पहले उम्मीदें सबसे ऊंची और वादे सबसे लंबे होते हैं।
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