कंगाली में ‘शराब’ सहारा—Pakistan ने 50 साल बाद खोला बीयर का दरवाज़ा

अजमल शाह
अजमल शाह

जिस देश में शराब पर पाबंदी को “धर्म” से जोड़ा गया, वहीं अब वही शराब “अर्थव्यवस्था” बचाने का जरिया बन रही है। यह सिर्फ एक policy change नहीं, बल्कि मजबूरी की वो कहानी है जहां ideology और economy आमने-सामने खड़े हैं। सवाल ये नहीं कि Pakistan शराब बेच रहा है, सवाल ये है कि क्या Pakistan अब अपने ही बनाए नियमों से हार रहा है।

एक तरफ जनता महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रही है, दूसरी तरफ सरकार विदेशी मुद्रा के लिए ऐसे रास्ते खोल रही है जिन्हें कभी “गुनाह” कहा गया था। यह contradiction ही इस कहानी का सबसे बड़ा सच है।

1977 का प्रतिबंध: धर्म या राजनीति?

Pakistan में 1977 से पहले शराब कोई taboo नहीं थी, लेकिन सत्ता बचाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। यह फैसला धार्मिक कम और राजनीतिक ज्यादा था क्योंकि उस वक्त कट्टरपंथी समूहों का दबाव अपने चरम पर था।

उस एक फैसले ने Pakistan की social policy को पूरी तरह बदल दिया, जहां शराब अचानक “illegal” बन गई लेकिन पूरी तरह खत्म कभी नहीं हुई। गैर-मुस्लिम नागरिकों और विदेशियों के लिए यह हमेशा loophole के रूप में मौजूद रही।

यानी policy सख्त थी, लेकिन ground reality हमेशा flexible रही। Pakistan में कानून अक्सर दिखाने के लिए बनते हैं, चलाने के लिए नहीं।

मजबूरी: डॉलर के लिए ‘ड्रिंक’

आज 50 साल बाद वही Pakistan, जो शराब को पाप मानता था, उसे export करके foreign currency कमाने की कोशिश कर रहा है। यह कोई ideological shift नहीं है, यह pure economic desperation है।

Foreign reserves गिर रहे हैं, IMF का दबाव बढ़ रहा है, और economy ICU में पड़ी है। ऐसे में सरकार के पास options कम हैं और decisions ज्यादा risky।

Murree Brewery को export की मंजूरी देना उसी desperation का हिस्सा है जहां सरकार अब morality से ज्यादा survival पर focus कर रही है। जब खजाना खाली हो, तो सिद्धांत सबसे पहले बिकते हैं।

मैरी ब्रुअरी: अंग्रेजों की विरासत, आज की जरूरत

Murree Brewery कोई नई कंपनी नहीं है, यह 1860 के दशक की colonial legacy है जिसे British entrepreneurs ने शुरू किया था। उस वक्त इसका मकसद सिर्फ अंग्रेज सैनिकों को beer उपलब्ध कराना था। 1947 में इसे एक पारसी परिवार ने खरीद लिया और आज इसके मालिक इस्फनयार भंडारा हैं, जो खुद Pakistan की National Assembly का हिस्सा हैं।

यह irony ही है कि जिस कंपनी को कभी colonial luxury माना जाता था, वही आज national survival tool बन चुकी है। इतिहास कभी खत्म नहीं होता, बस रूप बदलता है।

ब्रिटेन से जापान तक: Export Strategy

Pakistan ने शराब export करने का फैसला भी बड़ी चालाकी से लिया है। यह केवल उन देशों को export कर रहा है जो OIC (Islamic Cooperation Organization) का हिस्सा नहीं हैं।

April में Britain, Japan, Portugal और Thailand जैसे देशों को shipments भेजी गई हैं। यानी religious contradiction से बचने के लिए geopolitical filtering की गई है।

यह strategy दिखाती है कि Pakistan एक thin line पर चल रहा है—जहां उसे पैसा भी चाहिए और image भी बचानी है।  जब इमेज और जरूरत टकराते हैं, तो रणनीति पैदा होती है।

CPEC और ‘चीनी कनेक्शन’

2021 में Pakistan ने एक चीनी कंपनी को Balochistan में शराब बनाने की अनुमति दी थी, खासकर China-Pakistan Economic Corridor में काम कर रहे चीनी नागरिकों के लिए।

यह फैसला पहले ही बता चुका था कि Pakistan अपनी policies में flexibility दिखाने को तैयार है, बस उसे सही justification चाहिए।

अब वही flexibility बड़े scale पर दिख रही है, जहां export के जरिए इसे global level पर लागू किया जा रहा है। नीति वही बदलती है, जहां दबाव सबसे ज्यादा होता है।

विदेशी मुद्रा की ‘ऑक्सीजन’

Murree Brewery पहले ही non-alcoholic products से 100 million डॉलर कमा चुकी है, लेकिन असली उम्मीद अब alcohol export से है। सरकार को लगता है कि यह नया revenue stream foreign reserves को stabilize कर सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह sustainable solution है या सिर्फ temporary relief?

Experts का मानना है कि यह कदम short-term breathing space दे सकता है, लेकिन long-term economic reforms के बिना यह ज्यादा फर्क नहीं डालेगा।

नीति या पाखंड?

Pakistan की यह पूरी कहानी एक सवाल छोड़ती है—क्या यह policy shift है या policy failure? एक तरफ देश के अंदर शराब पर सख्त प्रतिबंध है, दूसरी तरफ वही शराब विदेशों में बेचकर पैसा कमाया जा रहा है।

यह contradiction सिर्फ economic नहीं है, यह ideological crisis भी है जहां rules selective हो गए हैं और morality flexible।

Pakistan आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां हर फैसला survival और contradiction के बीच फंसा हुआ है। शराब export करना सिर्फ एक economic move नहीं है, यह उस system का आईना है जो अपने ही बनाए नियमों में उलझ चुका है।

यह कदम economy को कुछ वक्त के लिए सहारा दे सकता है, लेकिन यह उस deeper crisis को नहीं छुपा सकता जो policy, governance और direction की कमी से पैदा हुआ है।

और सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—क्या Pakistan अपनी economy बचा रहा है, या अपने ही सिद्धांतों की आखिरी परत उतार रहा है?

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