मुस्लिम पिता ने बेटी के स्वस्थ होने पर कराई भागवत कथा… असली हिंदुस्तान है

शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

जब दुनिया नफरत की खबरों में उलझी हो, तब कुछ गांव इंसानियत की नई किताब लिख देते हैं। अलीगढ़ से आई यह तस्वीर सिर्फ खबर नहीं, उम्मीद का दस्तावेज है। जहां धर्म पीछे खड़ा है… और रिश्ते सबसे आगे।

Uttar Pradesh के अलीगढ़ जनपद के थाना चंडौस क्षेत्र के थानपुर-खानपुर गांव में Aziz Khan ने अपनी बेटी मेहरून के स्वस्थ होने की खुशी में सात दिवसीय Shrimad Bhagavatam कथा का आयोजन कराया है।

मन्नत पूरी हुई, वादा निभाया गया

बताया गया कि मेहरून लंबे समय से मानसिक रूप से अस्वस्थ थीं। परिवार ने इलाज कराया, दुआ मांगी, उम्मीद नहीं छोड़ी।

जब बेटी पूरी तरह स्वस्थ हुई, तो पिता ने वह किया जिसकी आज के शोरगुल वाले दौर में कम लोग कल्पना करते हैं—उन्होंने अपनी मन्नत पूरी करते हुए श्रीमद्भागवत कथा शुरू कराई। 27 अप्रैल से शुरू हुआ यह आयोजन अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है।

पंडाल में दिखी गंगा-जमुनी तस्वीर

कथा स्थल पर अजीज खान की पत्नी कल्लो बेगम और बेटी मेहरून श्रद्धा के साथ मौजूद रहीं। सबसे खास बात यह रही कि कार्यक्रम में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग बढ़-चढ़कर शामिल हुए। Mahesh Chandra Shastri के सानिध्य में चल रही कथा में भजन, कीर्तन और शंखनाद से माहौल भक्तिमय बना हुआ है। जहां टीवी डिबेट में लोग लड़ते हैं, वहां गांव साथ बैठा दिखा।

खेत बना सौहार्द का मंच

धनंजय सिंह के खेत में भव्य पंडाल सजाया गया है। एक तरफ धार्मिक आयोजन, दूसरी तरफ सामाजिक संदेश—यही वजह है कि यह कथा सिर्फ पूजा नहीं, समाज के लिए आईना बन गई है। ग्रामीणों का कहना है कि ऐसे आयोजन लोगों को जोड़ते हैं, तोड़ते नहीं।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस आयोजन ने पूरे क्षेत्र में सकारात्मक संदेश दिया है। लोगों का मानना है कि जब एक परिवार अपनी खुशी में पूरे गांव को शामिल करता है, तब जाति, धर्म और राजनीति की दीवारें छोटी पड़ जाती हैं। और सच यही है—दिल बड़ा हो तो पहचानें छोटी हो जाती हैं।

4 मई को होगा समापन

कथा का समापन 4 मई को हवन-यज्ञ और विशाल भंडारे के साथ होगा। बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। यानी यह आयोजन सिर्फ एक परिवार की खुशी नहीं, पूरे गांव का उत्सव बन चुका है।

अजीज खान ने क्या कहा?

Aziz Khan ने कहा कि उनकी बेटी की तबीयत लंबे समय से खराब थी। परिवार ने मन्नत मांगी थी कि बेटी ठीक होने पर श्रीमद्भागवत कथा कराएंगे। अब जब वह स्वस्थ है, तो संकल्प पूरा किया गया। सीधी भाषा, साफ नीयत… और दिल जीत लेने वाली बात।

असली भारत कहां बसता है?

सोशल मीडिया पर चीखते नारों में? या गांव के उस पंडाल में, जहां सब साथ बैठे हैं? यह कहानी बताती है कि भारत बहस से नहीं, भरोसे से चलता है। अलीगढ़ के एक गांव ने फिर याद दिलाया है—धर्म अगर जोड़ता नहीं, तो अधूरा है। एक पिता ने बेटी की खुशी में कथा कराई।
गांव ने उसमें इंसानियत देख ली। शायद यही वह भारत है, जिसे देखने की सबसे ज्यादा जरूरत है।

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