
सियासत की दुनिया में कुछ फैसले शोर से नहीं… भरोसे से गूंजते हैं। और ऐसा ही एक फैसला फिर सामने आया है। राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने Harivansh Narayan Singh को एक बार फिर राज्यसभा का सदस्य नामित किया है।
उनका कार्यकाल हाल ही में खत्म हुआ था लेकिन अनुभव ने उन्हें दोबारा सदन तक पहुंचा दिया। सियासत में कुर्सी बदलती है… भरोसा नहीं।
क्यों अहम है यह फैसला?
राज्यसभा के उपसभापति का पद सिर्फ एक पद नहीं… संतुलन की परीक्षा है। उपराष्ट्रपति (सभापति) की अनुपस्थिति में सदन की कार्यवाही संभालना। सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन बनाए रखना। जहां बहस गर्म हो… वहां दिमाग ठंडा रखना ही असली नेतृत्व है।
अटकलों पर लगा विराम
हाल के दिनों में चर्चा थी कि उनका कार्यकाल खत्म होने वाला है। नए नामों पर विचार किया जा सकता है। लेकिन इस नामांकन ने
सभी कयासों पर फुलस्टॉप लगा दिया। राजनीति में हर अफवाह की उम्र… एक फैसले तक होती है।
पत्रकार से संसद तक का सफर
Harivansh Narayan Singh का सफर काफी दिलचस्प रहा है शुरुआत पत्रकारिता से, Prabhat Khabar में लंबा कार्यकाल फिर राजनीति में एंट्री, Janata Dal (United) से जुड़ाव। कलम से शुरुआत… और संसद तक की कहानी।
नीतीश कनेक्शन भी अहम
उनकी राजनीति में एंट्री के पीछे Nitish Kumar की भूमिका अहम रही। उन्होंने हरिवंश को पार्टी में लाकर महासचिव की जिम्मेदारी दी।
सियासत में रिश्ते… कई बार रास्ता बना देते हैं।
शांत छवि, मजबूत पकड़
हरिवंश नारायण सिंह को एक शांत, संतुलित और संयमित नेता माना जाता है। कठिन हालात में भी सदन चलाने की क्षमता। विपक्ष और सत्ता दोनों का भरोसा। जो शोर में भी संतुलन बनाए… वही असली संचालक होता है।
यह नामांकन सिर्फ एक औपचारिक फैसला नहीं… बल्कि अनुभव पर भरोसे की मुहर है। संसद में आवाजें कई होती हैं…लेकिन संतुलन कुछ ही लोग बनाए रखते हैं।
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