
उत्तराखंड की ठंडी हवा में इन दिनों सियासत का तापमान उबाल पर है। चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन चालें अभी से चल दी गई हैं। मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami ने कैबिनेट विस्तार करके साफ कर दिया है कि 2027 की लड़ाई सिर्फ मैदान में नहीं, दिमाग में जीती जाएगी।
राजभवन में शपथ लेते चेहरों पर मुस्कान थी, लेकिन सियासी गलियारों में यह मुस्कान कई लोगों की बेचैनी बन चुकी है। पांच नए मंत्रियों की एंट्री ने सत्ता का बैलेंस ही बदल दिया है।
कौन बने मंत्री: चेहरों के पीछे छुपा मैसेज
इस विस्तार में खजान दास, मदन कौशिक, प्रदीप बत्रा, भरत चौधरी और राम सिंह कैड़ा को मौका मिला। ये सिर्फ नाम नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों और जातीय समीकरणों का पैकेज हैं।
देहरादून से लेकर नैनीताल तक एक मैसेज साफ है कि पार्टी अब हर सीट को माइक्रो-मैनेज कर रही है।
यह कैबिनेट विस्तार एक तरह का “पॉलिटिकल बैलेंसिंग एक्ट” है, जहां हर गुट को थोड़ा-थोड़ा संतुष्ट किया गया है, लेकिन पूरी तरह नहीं।
गणित बनाम हकीकत: संविधान की सीमा, सियासत की चाल
भारतीय संविधान के मुताबिक, उत्तराखंड में कुल 12 मंत्री ही हो सकते हैं। 70 सीटों वाली विधानसभा में यह सीमा तय है। अब तक सिर्फ 7 मंत्री थे, यानी 5 सीटें खाली थीं। धामी ने इन्हें भरकर एक तरह से “सियासी वैक्यूम” खत्म कर दिया है।

लेकिन असली सवाल यह है—क्या यह विस्तार प्रशासनिक जरूरत था या चुनावी मजबूरी?
अंदर की हलचल: संतुलन या सियासी दबाव
राजनीति में कुछ फैसले दिखते कम हैं, समझ आते ज्यादा हैं। इस विस्तार के पीछे दबाव की राजनीति भी छुपी हुई है। पार्टी के अंदर लंबे समय से मंत्री पद को लेकर खींचतान चल रही थी। कुछ चेहरे नाराज थे, कुछ इंतजार में थे। अब जिनको जगह नहीं मिली, वे चुप जरूर हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं। यही सियासत का असली ड्रामा है।
एक्सपर्ट की नजर: क्या कहते हैं सुरेन्द्र दुबे
पोलिटिकल एक्सपर्ट Surendra Dubey का मानना है, “यह कैबिनेट विस्तार सिर्फ प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि एक बेहद कैलकुलेटेड पॉलिटिकल मूव है। भाजपा को पता है कि उत्तराखंड में चुनाव भावनाओं से नहीं, समीकरणों से जीते जाते हैं। हर मंत्री एक ‘इलेक्टोरल इंवेस्टमेंट’ है। लेकिन खतरा यह है कि अगर ये मंत्री परफॉर्म नहीं करते, तो यही निवेश चुनाव में नुकसान भी बन सकता है। धामी ने दांव खेला है, अब रिजल्ट जनता के हाथ में है।”
गेम सेट, लेकिन मैच बाकी
उत्तराखंड की राजनीति अब नए मोड़ पर है। कैबिनेट विस्तार ने एक तरफ सरकार को मजबूती दी है, तो दूसरी तरफ नई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं। यह फैसला मास्टरस्ट्रोक भी साबित हो सकता है और सियासी रिस्क भी। अभी तो बस शपथ हुई है, असली परीक्षा अब शुरू होगी।
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