भारत को रूस से तेल खरीदने की 30 दिन की छूट- कितनी है तेल की भूख?

हुसैन अफसर
हुसैन अफसर

मिडिल ईस्ट की जंग अब सिर्फ मिसाइलों तक सीमित नहीं रही। इसका असर सीधे दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ने लगा है। ईरान और उसके आसपास के इलाकों में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरने वाली तेल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो गई है।

यह वही समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल गुजरता है। अब जब जहाज अटकने लगे हैं, तो तेल बाजार में बेचैनी साफ दिखाई दे रही है।

भारत के लिए अचानक खुला ‘रूसी दरवाज़ा’

ऐसे संकट के बीच अमेरिका ने एक चौंकाने वाला फैसला लिया। वॉशिंगटन ने भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिन की अस्थायी छूट देते हुए रूस से कच्चा तेल खरीदने की अनुमति दे दी। दिलचस्प बात यह है कि यह छूट सिर्फ उन रूसी टैंकरों के लिए है जो पहले से समुद्र में फंसे हुए हैं। अमेरिका का तर्क है कि इससे रूस को बड़ा आर्थिक फायदा नहीं मिलेगा, लेकिन ऊर्जा संकट से जूझ रहे देशों को राहत मिल जाएगी।

समुद्र में अटका 95 लाख बैरल तेल

इस समय एशियाई समुद्री क्षेत्र में रूसी तेल से भरे कई टैंकर इंतजार कर रहे हैं। करीब 95 लाख बैरल कच्चा तेल जहाजों में लदा हुआ है। अगर भारत इन कार्गो को खरीद लेता है तो दो फायदे होंगे। भारत की तेल सप्लाई बाधित नहीं होगी। रूस को भारी आर्थिक नुकसान से बचाया जा सकेगा। और सबसे बड़ा फायदा भारत को यह तेल डिस्काउंट रेट पर मिल सकता है।

महंगाई और पेट्रोल की कीमतों पर असर

अगर हॉर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो भारत जैसे आयातक देशों के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं। लेकिन रूसी तेल का यह अस्थायी विकल्प भारत को कुछ समय की राहत दे सकता है। इससे घरेलू ईंधन बाजार में कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिलेगी।

राजनीति का बड़ा यू-टर्न

यह फैसला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि कुछ ही महीने पहले अमेरिका ने भारत पर दबाव डालकर रूस से तेल खरीद बंद करवाया था। यूक्रेन युद्ध के बाद लगाए गए प्रतिबंधों के चलते। भारत-रूस ऑयल ट्रेड पर दबाव बना। अतिरिक्त टैरिफ की चेतावनी दी गई। नई ट्रेड डील की शर्तें रखी गईं। लेकिन अब वही अमेरिका ऊर्जा संकट के बीच अस्थायी छूट दे रहा है।

असली फायदा किसे?

अगर इस पूरे घटनाक्रम को ठंडे दिमाग से देखें तो तस्वीर दिलचस्प है। मिडिल ईस्ट में जंग, तेल सप्लाई में रुकावट, समुद्र में फंसे रूसी टैंकर और अचानक भारत के लिए खुला रास्ता। कहने को यह सिर्फ 30 दिन की अनुमति है, लेकिन असल में यह ग्लोबल ऑयल पॉलिटिक्स का नया अध्याय भी हो सकता है।

भारत की तेल भूख कितनी बड़ी है

भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और इसी वजह से उसकी ऊर्जा की भूख भी लगातार बढ़ रही है। आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश बन चुका है।

सीधी भाषा में कहें तो भारत की गाड़ियों, उद्योगों, हवाई जहाज़ों और बिजली संयंत्रों को चलाने के लिए रोज़ करीब 5.5 से 5.7 मिलियन बैरल तेल चाहिए। अगर इसे लीटर में समझें तो यह आंकड़ा चौंकाने वाला है लगभग 90 करोड़ लीटर तेल रोज़।

रोज़, महीने और साल की पूरी तस्वीर

अगर इस खपत को बड़े फ्रेम में देखें तो तस्वीर और भी भारी लगती है।

  1. रोज़: लगभग 56 लाख बैरल
  2. महीने में: करीब 16–17 करोड़ बैरल
  3. साल भर में: 2 अरब बैरल से भी ज्यादा

यानी भारत का पूरा आर्थिक इंजन तेल पर चलता है। और यही वजह है कि तेल की सप्लाई में हल्की सी रुकावट भी पूरी अर्थव्यवस्था को हिला सकती है।

भारत किन देशों से तेल खरीदता है

भारत ने पिछले कुछ सालों में तेल खरीदने की रणनीति बदली है। अब देश किसी एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं रहना चाहता। सबसे बड़े सप्लायर इस समय ये हैं:

  1. रूस – लगभग 36%
  2. इराक – लगभग 17%
  3. सऊदी अरब – लगभग 11%
  4. UAE – करीब 6–8%
  5. अमेरिका – करीब 5–7%
  6. कुवैत – लगभग 3–5%
  7. नाइजीरिया – करीब 2–3%

यह रणनीति इसलिए बनाई गई है ताकि किसी एक क्षेत्र में युद्ध या संकट होने पर भारत की ऊर्जा सप्लाई पूरी तरह ठप न हो जाए।

भारत खुद कितना तेल निकालता है

भारत पूरी तरह आयात पर निर्भर भी नहीं है। देश में खुद भी कुछ तेल उत्पादन होता है, लेकिन यह जरूरत के मुकाबले बहुत कम है।

  1. घरेलू उत्पादन: लगभग 9.5 लाख बैरल प्रतिदिन
  2. कुल जरूरत का हिस्सा: करीब 15%

सबसे बड़े तेल क्षेत्र हैं:

  1. मुंबई हाई (समुद्र में)
  2. असम के तेल क्षेत्र
  3. गुजरात के कुछ उत्पादन क्षेत्र

लेकिन सच यह है कि यह उत्पादन भारत की विशाल ऊर्जा भूख को पूरा करने के लिए काफी नहीं है।

हॉर्मुज क्यों बन जाता है भारत की टेंशन

भारत के लिए असली चिंता का नाम है स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज। दुनिया के सबसे अहम तेल समुद्री रास्तों में से एक यह स्ट्रेट मिडिल ईस्ट के तेल को एशिया तक पहुंचाता है। भारत के लगभग 60% तेल टैंकर इसी रास्ते से गुजरते हैं। अगर किसी वजह से यह रास्ता बंद हो जाए तो तेल की सप्लाई रुक सकती है, पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं। महंगाई तेजी से उछल सकती है। अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

यही कारण है कि भारत अब रूस, अमेरिका और अफ्रीकी देशों से भी तेल खरीदकर अपनी सप्लाई को diversify करने की कोशिश कर रहा है।

असली कहानी: ऊर्जा ही नई जंग है

आज की दुनिया में युद्ध सिर्फ मिसाइलों और टैंकों से नहीं लड़े जाते। कई बार सबसे बड़ी लड़ाई ऊर्जा सप्लाई की होती है। तेल की पाइपलाइन, समुद्री रास्ते और टैंकर यही असली जियोपॉलिटिक्स तय करते हैं। और भारत जैसे बड़े देश के लिए सवाल सीधा है ऊर्जा सुरक्षित तो अर्थव्यवस्था सुरक्षित।

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