मिडिल ईस्ट में ‘तेल-तूफ़ान’, क्रूड ऑयल 13% उछला- NATO सेना इंट्री होगी!

सैफी हुसैन
सैफी हुसैन, ट्रेड एनालिस्ट

मिडिल ईस्ट इस वक्त शतरंज की बिसात नहीं, बारूद की ढेरी बन चुका है। ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इजरायल समेत नौ देशों में हमले कर हालात को विस्फोटक बना दिया। जवाब में अमेरिका और उसके सहयोगी खुलकर मैदान में आ गए।

संयुक्त बयान में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, बहरीन, जॉर्डन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और यूएई ने साफ कहा कि वे अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए एकजुट हैं।

दूसरी तरफ पाकिस्तान ने ईरान के प्रति नरम रुख दिखाया है, जिससे क्षेत्रीय समीकरण और पेचीदा हो गए हैं।

Crude Oil में 13% का ‘Tsunami Jump’

जैसे ही मिसाइलों की गूंज उठी, ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल ने छलांग लगा दी। करीब 13% की तेज उछाल ने निवेशकों की नींद उड़ा दी। Energy traders के लिए यह volatility goldmine भी है और nightmare भी।

खाड़ी क्षेत्र से सप्लाई प्रभावित होने की आशंका ने कीमतों को rocket mode में डाल दिया। Shipping insurance महंगा, freight cost ऊपर, और इसका ripple effect सीधे आम जनता की जेब तक पहुंचेगा।

India पर क्या पड़ेगा असर?

भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अगर Middle East में टेंशन लंबा खिंचता है तो पेट्रोल-डीजल महंगे। महंगाई दर में उछाल। शेयर बाजार में अस्थिरता। रुपये पर दबाव।

सरकार के लिए balancing act आसान नहीं होगा। एक तरफ रणनीतिक रिश्ते, दूसरी तरफ energy security।

NATO और यूरोप का स्टैंड

NATO देशों ने ईरान की कार्रवाई की आलोचना की है। यूरोपीय संघ ने भी इसे destabilizing कदम बताया। अंतरराष्ट्रीय मंच पर ईरान की diplomatic isolation और गहराती दिख रही है।

Geo-Politics का नया Game Plan

यह सिर्फ मिसाइलों की जंग नहीं, narrative की भी जंग है। एक तरफ ‘self-defense’ का दावा, दूसरी तरफ ‘regional aggression’ का आरोप। Middle East फिर global power politics का laboratory बन गया है।

तेल, ताकत और तकरार की यह तिकड़ी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर रही है। सवाल यह है कि क्या यह आग सीमित रहेगी या पूरी दुनिया इसकी तपिश महसूस करेगी?

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