
लोकसभा में बुधवार को जो हुआ, वह सिर्फ हंगामा नहीं था — बल्कि लोकतांत्रिक चिंता का अलार्म था। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने साफ कहा कि उन्होंने खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सदन में आने से रोका, क्योंकि हालात इतने बिगड़े हुए थे कि “unpredictable situation” बन सकती थी।
यह बयान अपने आप में भारी है, क्योंकि आमतौर पर संसद में बहस होती है, चेतावनी नहीं।
क्यों रद्द हुआ PM मोदी का भाषण?
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने के लिए पीएम मोदी का भाषण तय था। लेकिन पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब ने संसद को रणक्षेत्र बना दिया।
एक तरफ राहुल गांधी किताब लेकर सवाल पूछ रहे थे, दूसरी तरफ बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने गांधी परिवार पर आरोपों की किताबें लहरा दीं। मतलब — किताबें पढ़ने के लिए नहीं, दिखाने के लिए थीं।
Speaker का सीधा आरोप: “शारीरिक नुकसान की आशंका”
स्पीकर ओम बिरला का बयान राजनीति से ज्यादा संसदीय सुरक्षा पर सवाल खड़े करता है। उनका कहना था कि अगर प्रधानमंत्री सदन में आते, तो उनके साथ कुछ भी गलत हो सकता था।
यह बयान विपक्ष पर सीधा लेकिन बिना नाम लिए वार माना जा रहा है।

लोकसभा स्थगित, लोकतंत्र Pause पर
शाम 5 बजे सदन दोबारा खुला, पोस्टर-तख्तियां उठीं, नारे लगे — और कुछ ही मिनटों में कार्यवाही शुक्रवार तक स्थगित कर दी गई। संसद चलनी थी, लेकिन चल रही थी सिर्फ political optics।
किताबों की लड़ाई, मुद्दे गायब!
देश महंगाई, बेरोजगारी, सुरक्षा पर जवाब चाहता है और संसद में हो रहा है “मेरी किताब बड़ी या तुम्हारी?”
अगर यही हाल रहा, तो अगली बार सांसदों के लिए Bookmark और Highlight Pen भी अनिवार्य कर देना चाहिए। लोकतंत्र शोर से नहीं, संवाद से चलता है — और फिलहाल संवाद Missing है।
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