
कांग्रेस का सबसे बड़ा और शायद आख़िरी बड़ा किला — कर्नाटक — अब अंदरूनी टकराव की चपेट में है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनके डिप्टी डीके शिवकुमार (DKS) के बीच पावर शेयरिंग को लेकर चल रही खींचतान अब खुलकर राष्ट्रीय स्तर की खबर बन चुकी है।
राज्य में शासन का पहिया धीरे चलने लगा है और कांग्रेस की साख पर सवाल उठने लगे हैं। दूसरी तरफ बीजेपी वेट-एंड-वॉच मोड में quietly मुस्कुरा रही है।
BJP की रणनीति: “देखो और इंतज़ार करो”
भले ही बीजेपी खुलकर कोई कदम नहीं उठा रही, लेकिन मौके पर प्रहार करने का मौका वो कभी नहीं छोड़ती। कर्नाटक से केंद्रीय मंत्री वी. सोमन्ना ने चुटकी लेते हुए कहा, “BJP को DK Sivakumar की कोई ज़रूरत नहीं है। अगर कांग्रेस में हिम्मत है तो विधानसभा भंग करे और चुनाव करवाए।”
साथ ही राज्य की सड़कों की हालत, भ्रष्टाचार और “पावर शेयरिंग ड्रामा” को लेकर कांग्रेस पर जमकर हमला भी बोला।
DK शिवकुमार vs सिद्धारमैया: टकराव किस ओर जा रहा है?
DK Shivakumar ने हाल ही में कहा कि पावर शेयरिंग पर “सीक्रेट डील” हुई थी और “जुबान की कीमत सबसे बड़ी होती है।”
ये सीधा संकेत था कि सिद्धारमैया को आधे कार्यकाल बाद कुर्सी छोड़ देनी चाहिए।
जवाब में सिद्धारमैया भी पीछे नहीं हटे, “2023 का मैनडेट पूरे 5 साल के लिए है।”

मतलब दोनों के बीच तनातनी अब सार्वजनिक और तीखी हो चुकी है।
सोनिया, राहुल और खरगे करेंगे ‘कुर्सी संकट’ पर फैसला
कांग्रेस हाईकमान जल्द ही दोनों नेताओं — सिद्धारमैया और शिवकुमार — की बैठक करने जा रहा है।
यही बैठक तय करेगी कि सत्ता की कुर्सी बदलेगी या नहीं पावर शेयरिंग डील का क्या होगा या यह मामला बस वक्त के साथ ठंडा कर दिया जाएगा। लेकिन नुकसान तो हो चुका है — पार्टी की छवि डैमेज हो रही है और प्रशासन की गति प्रभावित हो रही है।
कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती — कहीं ‘आखिरी बड़ा किला’ भी न ढह जाए
हिमाचल और तेलंगाना में पहले से चुनौतियां हैं। कर्नाटक को बचाए रखना कांग्रेस के लिए लाइफलाइन जैसा है। ऐसे में पावर वॉर अगर और बढ़ा — तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलता दिखेगा।
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