
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100वें वर्ष के मौके पर आयोजित समारोह में प्रमुख मोहन भागवत ने जनसंख्या पर एक चौंकाने वाला बयान देते हुए कहा:
“देश की नीति हर नागरिक को 2.1 बच्चे रिकमंड करती है। इसलिए तीन बच्चे हों – यही ज़िम्मेदारी है।”
हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा:
“जो सोचता है कि इस्लाम नहीं रहेगा, वो हिंदू नहीं हो सकता।”
बयान ने तुरंत ही राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया।
ओवैसी का पलटवार: “आप कौन होते हैं लोगों के बेडरूम में झाँकने वाले?”
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मोहन भागवत के बयान को निजता में हस्तक्षेप करार देते हुए कहा:
“आरएसएस हमेशा से यह झूठा भ्रम फैलाता रहा है कि मुस्लिम आबादी हिंदुओं से आगे निकल जाएगी। जबकि हकीकत ये है कि मुस्लिमों की प्रजनन दर बाकी सभी समुदायों से तेज़ी से घटी है।”
उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर भी कटाक्ष करते हुए पूछा:
“2024 में संसद में मोदी ने मुस्लिमों को जनसंख्या वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार ठहराया था, अब वही लोग कह रहे हैं कि तीन बच्चे पैदा करो। ये दोगलापन क्यों?”
Savarkar से लेकर ‘दो राष्ट्र’ तक – ओवैसी का हिस्ट्री लेसन
ओवैसी ने मोहन भागवत को याद दिलाया कि:
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हेडगेवार और सावरकर दोनों को आरएसएस नायक मानता है
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1937 में सावरकर ने हिंदू महासभा में ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ रखा था
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1940 में मुस्लिम लीग ने उसी विचार को अपनाया
“उस समय हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग सत्ता में साझेदार थे। इतिहास को selectively पढ़ना बंद करें।”
‘मुगल औलाद’, ‘चोरी का सामान’ – कौन फैला रहा है नफरत?
ओवैसी ने आरोप लगाया कि:
“मोहन भागवत कई बार मुसलमानों को ‘चोरी का सामान’ और ‘मुगल बादशाह की औलाद’ कह चुके हैं। धर्म संसदों में मुसलमानों के नरसंहार की बातें कौन कर रहा है? ये सब आरएसएस से जुड़े संगठन ही हैं।”
उन्होंने यह भी कहा:
“हम ऐसी ताकतों को राजनीति से हमेशा के लिए बाहर करने की कोशिश कर रहे हैं।”
क्या मुस्लिम आबादी वाकई बढ़ रही है?
सरकारी और स्वतंत्र रिपोर्ट्स के मुताबिक:
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भारत की जनसंख्या वृद्धि दर 2011 के बाद लगातार गिर रही है
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मुस्लिम TFR (Total Fertility Rate) 1992 में 4.4 था, जो अब 2.3 पर आ गया है
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ये घटाव हिंदुओं की तुलना में तेज़ है
यानी जिस “डेमोग्राफिक डर” को आधार बनाया जा रहा है, उसका कोई ठोस डेटा नहीं है।
जनसंख्या पर चिंता, या राजनीति का प्रजनन?
मोहन भागवत का “तीन बच्चे” वाला बयान महज़ जनसंख्या नीति पर सुझाव था या एक छिपा हुआ राजनीतिक संदेश?
ओवैसी की प्रतिक्रिया साफ़ दिखाती है कि यह बहस अब सिर्फ आंकड़ों की नहीं, विचारधाराओं की लड़ाई बन चुकी है। आने वाले चुनावों में यह मुद्दा फिर से चर्चा में रहेगा या सिर्फ़ एक और ‘बयान-बम’ बनकर रह जाएगा?
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