
पश्चिम बंगाल में शासन को और अधिक जनसुलभ (public-friendly) बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया है। राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने आज राजभवन का नाम बदलकर ‘लोक भवन’ कर दिया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से औपचारिक स्वीकृति मिलने के बाद यह बदलाव तुरंत लागू कर दिया गया।
राज्यपाल बोस के अनुसार, यह सिर्फ एक नाम-परिवर्तन नहीं बल्कि शासन और जनता के बीच दूरी कम करने की शुरुआत है। उनका कहना है कि अब यह भवन केवल सत्ता का प्रतीक नहीं, बल्कि ऐसा स्थान बनेगा जहाँ आम नागरिक बिना औपचारिकता अपनी बात रख सकें।
चारों गेट से लेकर गाड़ियों तक—हर जगह बदला नाम
नाम बदलते ही राजभवन परिसर में बड़े पैमाने पर बदलाव शुरू हो गए। पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण—चारों मुख्य द्वारों पर नया बोर्ड लगा दिया गया। भवन के अंदर मौजूद लगभग सभी संकेत बोर्डों से भी ‘राजभवन’ हटाकर ‘लोक भवन’ लिख दिया गया। यही नहीं, राजभवन से संबंधित सरकारी वाहनों पर भी नया नाम अंकित कर दिया गया है। राज्यपाल का कहना है कि यह नया नाम उन नागरिकों के लिए भरोसे का संदेश है जो अपनी समस्याएँ सीधे यहाँ लेकर आते हैं।
पहले भी किया था बड़ा बदलाव—सिंहासन कक्ष का नाम बदलकर ‘सरदार पटेल एकता कक्ष’
यह पहला अवसर नहीं है जब राज्यपाल बोस ने किसी महत्वपूर्ण हिस्से का नाम बदला हो। इससे पहले उन्होंने राजभवन की पहली मंजिल का नाम सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम पर रखा, और सिंहासन कक्ष को बदलकर ‘सरदार वल्लभभाई पटेल एकता कक्ष’ कर दिया।

यह कदम लौह पुरुष वल्लभभाई पटेल की एकता और राष्ट्रनिर्माण की भावना को सम्मान देने के उद्देश्य से उठाया गया था।
Public-first Governance: A New Symbol for Bengal
राजभवन का ‘लोक भवन’ में बदलना इस बात का संदेश है कि गवर्नेंस अब ज्यादा पारदर्शी, accessible और लोक-केंद्रित होगा।
राज्यपाल का यह कदम सोशल प्लेटफॉर्म्स पर चर्चा में है और लोग इसे “power to people” की दिशा में सकारात्मक प्रयास के रूप में देख रहे हैं।
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