पत्रकार से साहित्यकार तक: विक्रम राव की याद में बहा भावनाओं का सैलाब!

महेंद्र सिंह
महेंद्र सिंह

22वें राष्ट्रीय पुस्तक मेले में हिंदी दिवस के अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार डॉ. के. विक्रम राव को याद करते हुए एक भावपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया। विषय था: “पत्रकार की यात्रा, साहित्यकार तक”, जो राव जी के बहुआयामी व्यक्तित्व को समर्पित रहा।

पत्नी डॉ. सुधा राव की स्मृतियाँ: “सात दशक की साथी”

कार्यक्रम की शुरुआत स्वर्गीय राव जी की धर्मपत्नी, पूर्व मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. के. सुधा राव द्वारा साझा की गई निजी स्मृतियों से हुई। उन्होंने कहा:

“उनकी लेखनी जितनी तेज़ थी, उतना ही सरल और विनम्र था उनका स्वभाव।”

“फ़िल्म, रंगमंच और पत्रकारिता का संगम थे राव साहब” – अनिल रस्तोगी

मुख्य वक्ता और वरिष्ठ अभिनेता अनिल रस्तोगी ने राव साहब को याद करते हुए कहा:

“उनकी फ़िल्म और रंगमंच की समझ गहराई से भरपूर थी। 1978 से उन्हें जानता आया हूँ, उनके बुंदेलखंड और गुजरात पर लेख ऐतिहासिक हैं।”

“पत्रकार और साहित्यकार का अद्वितीय संगम” – सूचना आयुक्त द्विवेदी

उत्तर प्रदेश के सूचना आयुक्त पी.एन. द्विवेदी ने उन्हें “पितृ तुल्य” बताते हुए कहा:

“हर पत्रकार के भीतर एक साहित्यकार छुपा होता है, और राव साहब ने हिंदी को बहुआयामी मंच दिया।”

सूचना आयुक्त दिलीप अग्निहोत्री ने जोड़ा:

“वो स्वयं में एक पत्रकारिता संस्थान थे, उनकी भाषा शैली अद्वितीय थी।”

“अच्छे लेखकों को करते थे सराहना भरे कॉल” – सुधीर मिश्रा

वरिष्ठ संपादक सुधीर मिश्रा ने बताया:

“राव साहब सिर्फ लेख पढ़कर ही नहीं, बल्कि लेखकों को कॉल करके बधाई देते और रचनात्मक सुझाव भी साझा करते।”

“राव साहब को विषय की अलग दृष्टि का वरदान था” – राजकुमार सिंह

वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह ने कहा:

“उनकी लेखनी में विश्लेषण की गहराई और दृष्टिकोण की भिन्नता थी। डॉ. लोहिया पर उनका शोध दुर्लभ है।”

“IPS छोड़ा, पत्रकारिता को चुना – यही था असली जुनून” – नवल कांत सिन्हा

वरिष्ठ पत्रकार नवल कांत सिन्हा ने राव जी के साहसिक निर्णय को याद करते हुए कहा:

“उन्होंने IPS की नौकरी छोड़ी और पत्रकारिता को सर्वोपरि माना। उनकी सूखी खबर को रोचक बना देने की कला बेजोड़ थी।”

“पत्रकारिता की साधना के 62 साल” – राजीव श्रीवास्तव

वरिष्ठ पत्रकार राजीव श्रीवास्तव ने कहा:

“62 वर्षों तक लगातार पत्रकारिता में सक्रिय रहना आसान नहीं। राव जी अंतिम समय तक लेखन में डटे रहे। संवाद सूत्रों से लेकर संपादकों को उनका हौसला बढ़ाना अविस्मरणीय था।”

“वर्तनी और व्याकरण पर उनका आग्रह अनुकरणीय” – शिल्पी सेन

कार्यक्रम का संचालन कर रहीं वरिष्ठ पत्रकार शिल्पी सेन ने कहा:

“राव जी का लेखन नई पीढ़ी को वर्तनी और व्याकरण के प्रति सजग करता था। उनकी टिप्पणियाँ आज भी संदर्भ मानी जाती हैं।”

शब्दों के साधक को श्रद्धांजलि

कार्यक्रम का समापन वरिष्ठ संपादक शिवशरण सिंह के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने कहा:

“राव जी का योगदान किसी एक विधा तक सीमित नहीं था। वे पत्रकार, लेखक, समीक्षक और मार्गदर्शक – सभी कुछ थे।”

एक प्रेरणा जो आज भी जीवित है

यह आयोजन सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक जीवित प्रेरणा का उत्सव था। डॉ. के. विक्रम राव की यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए प्रकाशपुंज है, जो शब्दों को ज़िम्मेदारी और गहराई के साथ बरतना चाहता है।

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