
सरकारी नौकरी को भारत में लोग जीवन की अंतिम मंज़िल मानते हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश में एक ऐसा भी “सरकारी कलाकार” निकला जिसने नौकरी को मंज़िल नहीं बल्कि डबल इनकम स्कीम बना लिया. एक ही मार्कशीट, एक ही पहचान और दो-दो सरकारी विभाग.
करीब 17 साल तक सरकारी खजाने से दो जगह से वेतन उठाने का खेल चलता रहा और सिस्टम सोता रहा.
अब जब परतें खुलीं तो कहानी किसी फिल्मी स्कैम से कम नहीं निकली.
जब नौकरी बनी ‘डबल इनकम स्कीम’
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी और प्रतापगढ़ जिलों से सामने आया यह मामला सरकारी व्यवस्था की सुस्ती पर करारा तमाचा बन गया है. जयप्रकाश सिंह नाम के व्यक्ति ने पहले 1979 में प्रतापगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में नौकरी हासिल की. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई.
करीब 14 साल बाद यानी 1993 में उसी व्यक्ति ने बाराबंकी के शिक्षा विभाग में शिक्षक की नौकरी भी ज्वाइन कर ली. सबसे दिलचस्प बात यह कि दोनों नौकरियों में इस्तेमाल किए गए दस्तावेज भी लगभग एक जैसे थे.
सरल शब्दों में कहें तो एक आदमी दो विभाग दो सैलरी और सिस्टम को भनक तक नहीं. सरकारी रिकॉर्ड की फाइलों के बीच यह “डबल रोल” करीब 17 साल तक चलता रहा.
RTI की दस्तक और खुल गया खेल
हर स्कैम की कहानी में एक किरदार ऐसा होता है जो पर्दा हटाता है. इस मामले में वह नाम था प्रभात सिंह. 2009 में उन्होंने इस मामले को लेकर शिकायत दर्ज कराई और सूचना का अधिकार (RTI) के जरिए दोनों जिलों से जानकारी मांगी.
जब रिकॉर्ड मिलाए गए तो अफसरों की आंखें खुली रह गईं. दस्तावेजों ने साफ दिखा दिया कि एक ही व्यक्ति एक ही समय दो सरकारी पदों पर तैनात था.

इसके बाद आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े की धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई.
कोर्ट का फैसला: अब जेल की बारी
लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद मामला अदालत पहुंचा. बाराबंकी की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सुधा सिंह की अदालत में गवाहों और दस्तावेजों की जांच हुई. सभी सबूतों को देखने के बाद अदालत ने जयप्रकाश सिंह को दोषी करार दिया.
फैसला सख्त था. अदालत ने आरोपी को 7 साल की कठोर कारावास और 30 हजार रुपये जुर्माना की सजा सुनाई. साथ ही आदेश दिया गया कि आरोपी ने वर्षों में जो सरकारी वेतन लिया है उसकी पूरी वसूली की जाए.
सिस्टम की नींद पर उठे बड़े सवाल
इस केस ने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया है. क्या सरकारी तंत्र इतना कमजोर था कि 17 साल तक कोई व्यक्ति दो जगह नौकरी करता रहा और किसी को पता ही नहीं चला? विशेषज्ञों का कहना है कि उस दौर में सरकारी रिकॉर्ड पूरी तरह डिजिटल नहीं थे. फाइलें कागजों में बंद रहती थीं और जिलों के बीच डेटा का कोई मजबूत सिस्टम नहीं था. यही वजह रही कि एक व्यक्ति ने सिस्टम की खामियों को अपना एटीएम बना लिया.
आज आधार, डिजिटल रिकॉर्ड और डेटा इंटीग्रेशन के दौर में ऐसी जालसाजी करना मुश्किल जरूर हुआ है. लेकिन यह मामला याद दिलाता है कि जब सिस्टम सोता है तो एक व्यक्ति पूरा तंत्र बेवकूफ बना सकता है. और जब सिस्टम जागता है तो अदालत का हथौड़ा गिरता है.
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