
विश्व आर्थिक मंच, दावोस से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस “Board of Peace” का ऐलान किया, वह सुनने में किसी ग्लोबल फेयर-टेल जैसा लगा—जहां दशकों की नफ़रत खत्म होगी, खून-खराबा रुकेगा और दुनिया में स्थायी शांति आएगी।
दुनिया, जो पहले ही थकी-हारी है, इस सपने पर यक़ीन करना चाहती है… लेकिन भरोसे से ज़्यादा यहां संदेह तेज़ है।
शांति बोर्ड या ट्रंप-सेंट्रिक सिस्टम?
लीक हुए ड्राफ्ट चार्टर के मुताबिक़, यह बोर्ड पूरी तरह ट्रंप के इर्द-गिर्द घूमता है। वह न सिर्फ़ इसके आजीवन चेयरमैन होंगे, बल्कि तय करेंगे कि कौन देश सदस्य बनेगा, कौन बाहर रहेगा, कौन सी संस्थाएं बनेंगी और कौन भंग होंगी।
यहां तक कि अपने उत्तराधिकारी को चुनने का अधिकार भी उन्हीं के पास होगा। और अगर कोई देश स्थायी सदस्य बनना चाहता है—तो कीमत है एक बिलियन डॉलर। शांति, लेकिन EMI में।
यूरोप अलर्ट मोड में
पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने साफ़ चेतावनी दी—“हमारे साथ कोई चालबाज़ी नहीं करेगा।” ब्रिटेन ने चिंता जताई कि पुतिन जैसे नेता अगर इस बोर्ड में आए, तो इसका मतलब क्या होगा? स्वीडन और नॉर्वे ने कूटनीतिक भाषा में दूरी बना ली। लेकिन हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान भावुक हो गए—“अगर ट्रंप हैं, तो शांति है।” यानी यूरोप दो हिस्सों में बंटा नज़र आया—एक सतर्क, दूसरा सम्मोहित।
ग़ज़ा के नाम पर बोर्ड, लेकिन चार्टर में ग़ज़ा गायब
सात मुस्लिम देशों ने कहा कि वे इस पहल में सिर्फ़ ग़ज़ा में न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति के लिए शामिल हो रहे हैं। विडंबना यह है कि लीक चार्टर में ग़ज़ा का नाम तक नहीं। यह शांति कम और नोबेल शांति पुरस्कार की लॉन्ग-टर्म कैंपेन ज़्यादा लगती है।
UN: कमजोर ज़रूर, लेकिन विकल्प?
193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र पिछले दशक में शांति स्थापना में बार-बार असफल रहा है। खुद यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेस मान चुके हैं कि आज दुनिया में “क़ानून की ताक़त” की जगह “ताक़त का क़ानून” हावी हो रहा है।
ट्रंप इसी कमजोरी को मौका बना रहे हैं—लेकिन सवाल है, क्या एक व्यक्ति-केंद्रित बोर्ड, वैश्विक प्रतिनिधित्व वाले UN से बेहतर हो सकता है?

ग्राउंड रियलिटी: संघर्षविराम ≠ शांति
ट्रंप दावा करते हैं कि उन्होंने आठ युद्ध खत्म कराए। यूएन के पूर्व अधिकारी साफ़ कहते हैं—ये युद्ध खत्म नहीं हुए, सिर्फ़ सीज़फायर हैं। रवांडा-कांगो, कंबोडिया-थाईलैंड और भारत-पाकिस्तान के उदाहरण दिखाते हैं कि शांति काग़ज़ पर टिकती है, ज़मीन पर नहीं।
ग़ज़ा और यूक्रेन: असली अग्निपरीक्षा
इस बोर्ड के भीतर ही दो ध्रुव हैं— एक तरफ़ नेतन्याहू, जो फ़लस्तीनी राज्य के विरोधी हैं, दूसरी ओर अरब देश, जो बिना आत्म-शासन के शांति को असंभव मानते हैं। और यूक्रेन में ज़ेलेन्स्की पहले ही साफ़ कर चुके हैं—मॉस्को के साथ एक मेज़ पर बैठना विकल्प नहीं।
ट्रंप कहते हैं—“यह दुनिया के लिए है।” दुनिया पूछ रही है— क्या यह शांति का रास्ता है, या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का री-ब्रांडिंग प्रोजेक्ट,
जहां UN की जगह एक नाम होगा—Trump?
FIR का आदेश दिया, कुर्सी बदल दी? संभल हिंसा केस में जज का ट्रांसफर चर्चा में
