जिस मां ने बिना नज़र झपकाए तुम्हारी लंगोटी बदली, आज उसकी दवाई के पैसे पर भी तुम्हारी आत्मा आहत हो जाती है? जिस बाप ने अपने जूते घिसा कर तुम्हारे लिए स्कूल की फीस भरी, वो आज तुम्हारे दरवाज़े पर ‘No Vacancy’ जैसा महसूस करता है? “मोबाइल में Face ID है, लेकिन मां-बाप का चेहरा अब पहचान में नहीं आता?” अब कानूनी पाठशाला खोलिए, साहब! भारत में ये समस्या देखकर कानून ने भी कह दिया – “Enough is Enough!” चिराग पासवान का ‘बिहार फर्स्ट’ ड्रामा: 2025 चुनाव से 2030 की छलांग!…
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