सुनो,अगर तुम्हारी पहचान तुम्हारे दिमाग से नहीं, तुम्हारी जाति से तय हो रही है, तो समझो कि समाज ने तुम्हें इंसान नहीं, फाइल बना दिया है। “जाति मेरे जूते की नाप है, दिमाग की नहीं” ये मैंने कोई नारा नहीं दिया। यह मानसिक आज़ादी का ऐलान है। जूते की नाप छोटी हो सकती है, बड़ी हो सकती है। बदल भी सकती है। लेकिन दिमाग? वह तो सीमाओं को तोड़ने के लिए बना है, उनमें कैद होने के लिए नहीं। युवाओं से सीधी बात तुम्हारी generation के पास इंटरनेट है, AI है,…
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सवर्ण + सोशल जस्टिस: विरोधाभास नहीं, वैचारिक विरासत
भारत में जाति को लेकर बहस अक्सर शोर में बदल जाती है, जहां पहचान को विचारधारा के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है। इसी माहौल में जब मैं कहता हूँ कि “मैं सवर्ण हूँ, लेकिन सोशल जस्टिस का कट्टर समर्थक हूँ”, तो उसे या तो अपवाद माना जाता है या संदेह की नजर से देखा जाता है। जबकि हकीकत इससे कहीं ज्यादा सीधी और संवैधानिक है। पहचान बनाम विचारधारा सवर्ण होना कोई वैचारिक प्रमाणपत्र नहीं है, मैं जन्मा ब्राहमण लेकिन पंडित नहीं हूँ क्योंकि मैं वेदपाठी नहीं हूँ। ठीक वैसे…
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