1955 की देवदास सिर्फ़ एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के emotional syllabus का अनिवार्य पाठ है। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित ये फिल्म बिमल रॉय की निर्देशन कला और दिलीप कुमार की संजीदा अदाकारी का ऐसा संगम है जिसे देखकर आज भी दिल टूटता है और आंखें नम हो जाती हैं। प्यार, समाज और चिट्ठियों के बीच पिसता देवदास कलकत्ता से लौटा देवदास (दिलीप कुमार), गांव की पारो (सुचित्रा सेन) से बचपन का प्यार चाहता है… पर जात-पात, समाज, और पारो के पिताजी की ego-powered शादी प्लानिंग…
Read MoreTag: हिंदी सिनेमा इतिहास
हीर राँझा (1970) रेट्रो रिव्यू: शायरी में डूबी मोहब्बत की सबसे दर्दनाक फिल्म
1970 में चेतन आनंद ने जो किया, उसे आज की पीढ़ी “Cinematic Audacity” कहेगी। पूरी फिल्म शायरी में बोलती है! नहीं, मतलब सच में — हर किरदार, हर डायलॉग, हर झगड़ा तक, सबकुछ तुकबंदी में। और इस प्रयोग को नाकाम नहीं, मास्टरपीस कहा गया। अखिलेश केदारनाथ बना बैठे, शंकराचार्य बन बैठे क्या-अब काबा भी बनवायेंगे ? राजकुमार: एक्टर नहीं, चलता-फिरता उर्दू शेर अगर आपको लगता है कि आजकल के हीरो स्टाइलिश हैं, तो ज़रा राजकुमार को देख लीजिए – नज़रों से तलवार चलाते हैं और जुबान से इश्क। उनके डायलॉग…
Read More