PDAs First Ayodhya Sammelan में कुर्सी पे कौन? मंच बना WWE का रिंग!

गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

अयोध्या में शनिवार को हुआ सपा का ‘प्रथम पीडीए महासम्मेलन’ — एक ऐतिहासिक मौका था सामाजिक न्याय, आरक्षण और संविधान के मूल्यों को दोहराने का। लेकिन कार्यक्रम की शुरुआत मंच पर ही एक ‘कुर्सी-धर्म संकट’ से हो गई।

कार्यकर्ताओं का ‘कुर्सी-मंथन’

सम्मेलन का मकसद था पिछड़े वर्गों की भागीदारी पर फोकस, लेकिन मंच पर कार्यकर्ता इस बात पर भिड़ गए कि किसे सामने बैठना है और किसे पीछे। सामाजिक न्याय के मुद्दों पर चर्चा होनी थी, पर मंच पर कुर्सियों की ‘सामाजिक असमानता’ ने सबका ध्यान खींच लिया।

सूत्रों की मानें तो, कुछ कार्यकर्ता इतने नाराज़ थे कि वे संविधान की प्रति से पहले अपनी ‘कुर्सी की प्रति’ को बचाना ज्यादा ज़रूरी समझ बैठे।

वरिष्ठ नेताओं की ‘संविधान-सेवा’

स्थिति को संभालने के लिए वरिष्ठ नेताओं को बीच-बचाव करना पड़ा — जिनका असली एजेंडा था संविधान की रक्षा, लेकिन मौके पर वे कुर्सियों की रक्षा सेना बन गए।

मंच की सुरक्षा व्यवस्था देख यही लगा कि अगली बार शायद कार्यक्रम स्थल का नाम बदलकर ‘संविधान Lawn’ से ‘कुर्सी Lawn’ कर दिया जाए।

अखिलेश यादव की ‘सोशल मीडिया से शांति अपील’

अखिलेश यादव ने कार्यक्रम से पहले ‘X’ पर ट्वीट कर शुभकामनाएं दी थीं। उन्होंने लिखा:

“संविधान-मान स्तंभ के सानिध्य में हम सामाजिक न्याय और आरक्षण को बचाए रखने का संकल्प दोहरा रहे हैं।”

लेकिन शायद उन्हें यह नहीं पता था कि कुछ कार्यकर्ता इस संकल्प को कुर्सी के नीचे दबा देंगे

संविधान बचाओ, कुर्सी संभालो

कार्यक्रम का सार यही रह गया कि:

“जब संविधान बचेगा, तभी आरक्षण बचेगा — और जब कुर्सी मिलेगी, तभी फोटो खिंचेगा!”

अंततः नेताओं ने सबको शांत किया, पर सवाल अब भी उठता है — अगर पीडीए समाज की इतनी गहराई है, तो मंच पर इतनी ऊँच-नीच क्यों?

सपा का ये सम्मेलन अगर कुछ सिखा गया, तो वो ये कि राजनीति में ‘कुर्सी’ सिर्फ प्रतीक नहीं, प्रेरणा है। मंच पर सामाजिक न्याय का भाषण देने से पहले मंच की कुर्सियाँ बराबर बाँटना जरूरी है।

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