
दुनिया की करीब आधी आबादी चावल को अपने मुख्य भोजन के रूप में रोज़ाना खाती है। फिलीपींस से लेकर भारत, चीन से बांग्लादेश तक — चावल सिर्फ़ पेट भरने का ज़रिया नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और पहचान का हिस्सा है।
तापमान, सूखा और बाढ़
जलवायु परिवर्तन के चलते बाढ़, सूखा और असहनीय तापमान जैसे हालात चावल उत्पादन को सीधे प्रभावित कर रहे हैं।
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भारत में 2024 में तापमान 53°C तक पहुंच गया
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बांग्लादेश में बार-बार बाढ़ फसलें तबाह कर रही है
खेती में पानी की बर्बादी
एक किलो चावल उगाने में 3,000–5,000 लीटर पानी लगता है। धान की खेती अधिकतर जलभराव वाले इलाकों में होती है, जिससे ज़मीन में मीथेन गैस बनती है — जो ग्रीनहाउस गैस का एक बड़ा स्रोत है।
AWD तकनीक (Alternate Wetting & Drying)
ब्रिटेन की कंपनी टिल्डा ने इस तकनीक को अपनाया जिसमें सिंचाई तब होती है जब खेत पूरी तरह सूख जाता है।
नतीजे:
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27% पानी की बचत
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45% तक मीथेन उत्सर्जन में कमी
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उत्पादन में 7% बढ़त

बाढ़-रोधी धान किस्में
IRRI ने एक ऐसा जीन खोजा है जो पौधे को 21 दिन तक पानी में ज़िंदा रख सकता है। बांग्लादेश के किसान अब ऐसे धान को पसंद कर रहे हैं जो बाढ़ में भी टिके।
आलू से उम्मीदें
चीन और बांग्लादेश ने चावल के विकल्प के रूप में आलू को बढ़ावा दिया, लेकिन…
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लोगों ने इसे गरीबी का खाना समझा
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सामाजिक स्वीकृति की कमी से ये योजना पूरी तरह सफल नहीं रही
चावल से दूरी इतनी आसान नहीं
वैज्ञानिक और नीति निर्माता समाधान खोज रहे हैं, लेकिन संस्कृति और भावनाओं से जुड़ी चीज़ें इतनी आसानी से बदली नहीं जातीं।
चावल के बिना जीवन की कल्पना अभी भी करोड़ों लोगों के लिए अधूरी है। समाधान सिर्फ़ टेक्नोलॉजी नहीं, सोशल अवेयरनेस और सांस्कृतिक सम्मान में भी है।
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