काठमांडू: नेपाल में हाल ही में आई अचानक बाढ़ को लेकर शुरुआती तौर पर भूकंप और ग्लेशियल झील के फटने जैसी आशंकाएं जताई गई थीं। लेकिन उपग्रह तस्वीरों और भूकंपीय आंकड़ों के विश्लेषण के बाद बाढ़ की संभावित वजह सामने आ गई है। जांच के अनुसार, नेपाल-तिब्बत सीमा के पास स्थित लिरुंग ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर करीब एक किलोमीटर नीचे घाटी में जा गिरा। इसके साथ बड़ी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा भी नीचे आया, जिससे नदी का प्रवाह प्रभावित हुआ और अचानक तेज बाढ़ की स्थिति बन गई।
इस घटना ने तेजी से गर्म हो रहे हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालय में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और तापमान में बदलाव से आने वाले समय में ऐसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है। इसका असर नेपाल के साथ-साथ भारत के हिमालयी और मैदानी इलाकों तक भी पहुंचने की आशंका है।
भूकंप नहीं, ग्लेशियर टूटने से पैदा हुआ था कंपन
बाढ़ के दौरान जमीन में कंपन दर्ज किया गया था। इसी वजह से शुरुआत में इसे भूकंप से जोड़कर देखा गया। हालांकि, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने भूकंपीय रिकॉर्ड की दोबारा जांच की। इसमें सामने आया कि उस इलाके में कोई भूकंप नहीं आया था। दर्ज किया गया कंपन ग्लेशियर के टूटने और उसके साथ मलबे के नीचे की ओर खिसकने से पैदा हुआ था। यानी शुरुआती तौर पर बाढ़ की वजह माने जा रहे भूकंप की आशंका सही नहीं निकली।
करीब एक किलोमीटर नीचे आ गिरा ग्लेशियर का हिस्सा
नेपाल-तिब्बत सीमा के पास लिरुंग ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर घाटी में गिरा। इसके साथ बर्फ, पत्थर और भारी मलबा भी नीचे आया। उपग्रह तस्वीरों में ग्लेशियर से घाटी तक एक नया निशान दिखाई दिया है, जो मलबे के नीचे आने के रास्ते की ओर संकेत करता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, ग्लेशियर के अंदर पहुंचने वाला पिघला हुआ पानी बर्फ और जमीन के बीच पकड़ को कमजोर कर सकता है। ऐसी स्थिति में ग्लेशियर का कोई हिस्सा अचानक खिसककर नीचे गिर सकता है। हालांकि, लिरुंग ग्लेशियर के टूटने की वास्तविक वजह का पता लगाने के लिए अभी और अध्ययन किया जा रहा है।
कुछ ही देर में कई गुना चौड़ी हो गई नदी
ग्लेशियर से नीचे आया भारी मलबा नदी तक पहुंचा और इससे पानी का सामान्य प्रवाह प्रभावित हो गया। इसके बाद पानी तेजी से नीचे की ओर बढ़ा। बाढ़ की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नदी का फैलाव कुछ ही समय में कई गुना बढ़ गया।
स्याफ्रुबेसी में नदी किनारे बसे इलाकों को भारी मलबे का सामना करना पड़ा। बेट्रावती बाजार में नदी की चौड़ाई करीब 90 मीटर से बढ़कर 490 मीटर तक पहुंच गई। वहीं, बिदुर में नदी का दायरा लगभग 100 मीटर से बढ़कर 549 मीटर हो गया। नदी के इस तरह फैलने से आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर तबाही हुई।
क्या नेपाल में फिर आ सकती है ऐसी बाढ़?
इस घटना के बाद वैज्ञानिकों की चिंता अभी खत्म नहीं हुई है। नेपाल-चीन सीमा के ऊपरी इलाकों में बड़ी मात्रा में मलबा जमा होने की आशंका है। यदि यह मलबा पानी के रास्ते को रोक देता है और बाद में अचानक टूटता है, तो नीचे की ओर एक बार फिर तेज बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के जलवायु एवं पर्यावरणीय जोखिम मामलों के प्रमुख छियांगगॉन्ग झांग ने भी ऐसे संभावित खतरों को लेकर चेतावनी दी है। वैज्ञानिकों की नजर अब ऊपरी पहाड़ी क्षेत्रों में जमा मलबे और वहां की बदलती परिस्थितियों पर है।
तेजी से गर्म हो रहा हिमालय क्यों बढ़ा रहा है चिंता
वैज्ञानिक फिलहाल इस घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम नहीं मान रहे हैं। हालांकि, बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और बर्फ के भीतर पानी का पहुंचना ऐसी परिस्थितियां पैदा कर सकते हैं, जिनसे ग्लेशियरों के अस्थिर होने का खतरा बढ़ सकता है।
नेपाल की इस घटना ने एक बार फिर दिखाया है कि हिमालय में बर्फ, पानी, चट्टान और मौसम की परिस्थितियां आपस में गहराई से जुड़ी हैं। पहाड़ों में होने वाली कोई छोटी घटना भी नीचे बसे इलाकों में अचानक बड़े पैमाने पर तबाही का कारण बन सकती है।
